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8-10 पाक सैनिकों को ढेर कर वीरगति को प्राप्त हुए थे धर्मवीर सिंह

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संवाद न्यूज एजेंसी
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झज्जर। कारगिल युद्ध के ऑपरेशन विजय में वीर भूमि के सपूत धर्मवीर सिंह ने अदम्य साहस का परिचय दिया था। उन्होंने पैर में गोली लगने के बावजूद हार नहीं मानी और अंतिम सांस तक दुश्मन सैनिकों का डटकर सामना किया।
7 जुलाई 1999 को अपनी जान न्योछावर करने से पहले उन्होंने 8-10 पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया था। फिर अचानक सिर में गोली लगने के बाद वह वीरगति को प्राप्त हो गए थे। उनका बलिदान देश हमेशा याद रखेगा।
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मूल रूप से झज्जर के गांव ढाकला निवासी धर्मवीर सिंह ने मात्र 26 साल की उम्र में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया था। वह जाट रेजिमेंट में सिपाही के पद पर तैनात थे और 1993 में सेना में भर्ती हुए थे।
धर्मवीर सिंह का जन्म अप्रैल 1973 में किसान सूबेदार सिंह और बेदकौर के घर हुआ था। कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने सीमा से पत्नी विद्या देवी के नाम एक पत्र लिखा था।
पत्र में उन्होंने बच्चों का ध्यान रखने और उन्हें पालने की बात कही थी। 7 जुलाई 1999 को दुश्मन से लोहा लेते हुए उन्होंने देश के नाम अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। अंतिम संस्कार के समय गांव और आसपास के हजारों लोग श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे। बाद में सरकार ने उनके परिजनों को एक गैस एजेंसी आवंटित की थी।

शहादत के समय छह माह का था बेटा, बेटी थी दो साल की
धर्मवीर सिंह आखिरी बार घर तब आए थे, जब उनका बेटा पैदा हुआ था। उनकी शहादत के समय बेटे की उम्र केवल छह माह और बेटी की उम्र दो साल थी। उनकी पत्नी विद्या देवी के जेहन में आज भी उनके पत्र के शब्द लिखे हुए हैं। अब उनकी बेटी सोमी ने एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी कर ली है। बेटे लोकेश ने एलएलबी और एलएलएम की शिक्षा प्राप्त की है।
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बलिदानी धर्मवीर सिंह की प्रतिमा बनाने के लिए गांव ढाकला की ओर से गांव में ही जमीन दी गई थी। परिवार ने उस स्थान पर उनकी प्रतिमा बनवाई। आज वह प्रतिमा गांव के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बनी हुई है। यह प्रतिमा उनके सर्वोच्च बलिदान को याद दिलाती है।
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