बहादुरगढ़। पाकिस्तान से भारत आए हजारों परिवारों में से एक है बहादुरगढ़ का सलूजा परिवार। आज यह परिवार बहादुरगढ़ की पहचान का हिस्सा बन चुका है। संदीप सलूजा ने बताया कि उनके दादा चेतन दास सलूजा मूल रूप से पाकिस्तान के लैय्या जिले के मियांवाली गांव के रहने वाले थे। वर्ष 1947 के विभाजन के दौरान उन्हें अपना घर-बार छोड़कर भारत आना पड़ा।
भारत पहुंचने के बाद परिवार को अंबाला के शरणार्थी कैंप में ठहराया गया। कुछ समय बाद कैंप खाली कराए जाने पर उन्हें रोजगार और रहने की नई जगह की तलाश करनी पड़ी। काफी प्रयासों के बावजूद अंबाला में स्थायी काम नहीं मिला तो परिवार बहादुरगढ़ आ गया। उस समय शहर में संसाधन सीमित थे लेकिन उनके दादा चेतनदास सलूजा ने हार नहीं मानी और मेहनत के बल पर नई शुरुआत की।
संदीप के अनुसार, उनेक दादा चेतनदास सलूजा ने गांधी चौक स्थित पुरानी मंडी में सब्जी बेचने का काम शुरू किया। करीब 40 वर्षों तक उन्होंने सब्जी का कारोबार किया और परिवार का पालन-पोषण किया। बाद में उन्होंने मुख्य बाजार में कपड़ों की फड़ी लगानी शुरू की, धीरे-धीरे मेहनत रंग लाई और परिवार ने रेडीमेड कपड़ों के कारोबार में कदम रखा।
दादा के चार पुत्र थे, मुरलीधर, ओमप्रकाश, राधेश्याम और सुखदयाल। समय के साथ परिवार का कारोबार बढ़ता गया। पिता ओमप्रकाश ने कढ़ाई और पिको का काम शुरू किया जबकि परिवार के अन्य सदस्यों ने भी अलग-अलग व्यवसाय अपनाए। वर्तमान में सुखदयाल मुख्य बाजार में चूड़ियों का कारोबार कर रहे हैं। वहीं संदीप सलूजा सलूजा ट्रेडर्स के नाम से शहर में अपनी पहचान बना चुके हैं।
मुरलीधर का परिवार शहर के मेन बाजार में जनरल स्टोर चला रहा है। चार भाइयों में से अब तीन का निधन हो चुका है। कहा कि विभाजन के दर्द और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उनके पूर्वजों ने मेहनत, ईमानदारी और संघर्ष के दम पर बहादुरगढ़ में अपनी नई पहचान बनाई। सलूजा परिवार की यह कहानी केवल एक परिवार के संघर्ष की गाथा नहीं, बल्कि उन लाखों शरणार्थियों के साहस का प्रतीक है जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी।
-फोटो 82 : मेन बाजार में अपनी दुकान पर बैठे संदीप कुमार। संवाद