बूचड़खाने बंद होने से एक महीने में गोश्त के फुटकर कारोबारियों को करीब 12 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। ये वह कारोबारी हैं जो इसमें छोटे व्यवसायी जुड़े हैं, जिनका नुकसान हुआ है। बाकी सैकड़ों करोड़ रुपये के गोश्त का एक्सपोर्ट कारोबार करने वाले उद्योगपतियों पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। स्लॉटर हाउस बंद होने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर एक लाख छोटे कारोबारी इससे जुड़े हैं।
वैकिल्पक व्यवस्था कराने की मांग
गोश्त कारोबारियों के संगठनों ने शासन और प्रशासन से मांग की है कि जब तक नगर निगम के कर्नलगंज बकरमंडी स्थित बूचड़खाने के आधुनिकीकरण के लिए सरकार से 13 करोड़ रुपये धन आवंटित हो चुका है। इस सप्ताह इसके बनाने के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। जमीयतुल कुरैशी गरीब नवाज के संरक्षक गुफरान अहमद चांद ने बताया कि इसके बनने में करीब दो साल तक का समय लग सकता है। ऐसे में कारोबारी भुखमरी की कगार पर न खड़े हों। इसकी व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए।
100 भैंस, 200 बकरा स्लॉटरिंग की क्षमता
बकरमंडी स्लॉटर हाउस में 100 भैंस और 200 बकरों की रोजाना स्लॉटरिंग करने की क्षमता है। एक भैंस की औसत कीमत 20 हजार और बकरा की 10 हजार रुपये है। ऐसे में रोजाना 40 लाख रुपये और साल में 12 करोड़ रुपये का कारेाबार सीधा प्रभावित है। यह सिर्फ कच्चा कारोबार (गोश्त के कारोबारी) है। इसके अलावा होटलों में नॉनवेज बेचने वाले, चमड़ा कारोबार (खालों की बिक्री) का कारोबार भी हाशिए पर आ गया है।
बन रहे मुर्गे, मछली के लाइसेंस
नगर निगम में मुर्गेे और मछली के गोश्त का व्यवसाय करने वालों को अनुमति है। इसके लिए नगर निगम में 50 रुपये फीस के साथ लाइसेंस बन रहे हैं। दो फोटो, एक शपथपत्र और पहचान पत्र की कॉपी जमा हो रही है। जबकि बकरा और भैंस के गोश्त बेचने वालों के लाइसेंस नहीं बन रहे हैं क्योंकि स्लॉटरिंग पर ही रोक लगी है। भैंस और बकरा का लाइसेंस न बनाने से छोटे कारोबारी एक्सपोर्ट कंपनियों से मीट लाकर दुकानों में नहीं बेच पा रहे हैं।
एनजीटी को कानूनी नोटिस भेजने को तैयारी
व्यवसाय से जुड़े संगठनों का कहना है कि एनजीटी के आदेश से प्रदेश के 28 बूचड़खाने (नगर निगम द्वारा संचालित) प्रभावित हुए लेकिन आगरा और बरेली में बूचड़खाने चल रहे हैं। वजह है कि यहां पर नगर निगम ने अस्थाई ट्रीटमेंट प्लांट बना दिया था। इसलिए यह वैध हो गए। कानपुर भी इसकी जद में नहीं आता है क्योंकि बूचड़खाने के दस फिट की दूरी पर शहर का सबसे बड़ा नाला (गंदा नाला) है। यहां कोई नदी नहीं है। एक जानवर के स्लॉटरिंग में करीब 20 लीटर पानी ही खर्च होता है। इसलिए कारोबारी एनजीटी को कानूनी नोटिस भेजने की तैयारी कर रहे हैं।
सरकार साफ करे मंशा
गुफरान अहमद चांद का कहना है कि सरकार को मंशा साफ करना चाहिए कि वह किसी को नॉनवेज खाने पर रोकना चाहती है या फिर इस कारोबार से जुड़े अधिसंख्य गरीबों की रोजी रोटी छीनने का प्रयत्न है। अगर सरकार को अवैध को वैध में बदलना है तो उस दिशा में सरकारी संस्थाएं उचित कदम क्यों नहीं उठा रही हैं। जिससे कि लाइसेंस प्रक्रिया आसानी हो।
अवैध बूचड़खाने बंद कर देना कहां की समझदारी
शहर में चल रहे अवैध बूचड़खाने को प्रदेश सरकार की सख्ती के चलते स्थानीय प्रशासन ने आनन फानन में बंद तो करा दिया लेकिन मांस के शौकीन और इस कारोबार से जुड़ी शहर की बड़ी आबादी के लिए कोई वैक ल्पिक इंतजाम नहीं किया गया। नतीजा यह है कि चोरी छिपे जानवरों का कटान जारी है, जिससे शहर में गंदगी भी फैल रही है। गंदगी साफ करने वाले विभाग को आखिर यह समझ में क्यों नहीं आ रहा। इस बीच पता चला है कि नगर निगम ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को अवैध बूचड़खाने को एनओसी देकर उसे फिर से चालू कराने की प्रक्रिया में सहयोग देने की बात जरूर उठाई है, लेकिन तात्कालिक समाधान अभी भी होना बाकी है।
कर्नलगंज स्थिति बकरमंडी के बूचड़खाने को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एनओसी नहीं मिलने से 2013 में सील कर दिया गया था। उसके कुछ ही दिन बाद इस मसले पर तत्कालीन स्थानीय सपा नेताओं ने आगे आकर इसे खुलवा तो दिया लेकिन एनओसी लेने की प्रक्रिया पूरी नहीं कराई गई। 2017 में जैसे ही सरकार बदली, प्रशासनिक अधिकारियों ने तत्काल बूचड़खाने को फिर से सील कर दिया। सवाल उठता है कि शहर की इतनी बड़ी आबादी जो मांस से सीधे जुड़ी हैं, उसको प्रशासन ने किस अधिकार से मांस खाने और उसका कारोबार करने से रोक दिया। इसका कोई समाधान क्यों नहीं सोचा गया। इस संबंध में नगर आयुक्त उमेश प्रताप सिंह का कहना है कि यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को बकरमंडी बूचड़खाने को एनओसी देने के लिए विभागीय पत्र भेज दिया गया है। इसमें कितना समय लगेगा और इस बीच जानवरों की कटान का क्या होगा, इसका जवाब उनके पास नहीं है।