मुठभेड़ में मारे गए नक्सली के परिजन
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परतापुर एलजीएस कमांडर टुगे यानी नागेश लगभग 20 साल से अधिक समय तक नक्सलियों के साथ रहा। छोटी-छोटी बात को लेकर घर में विवाद से गुस्से में आकर भाभी व भाईयों से लड़कर नक्सलियों के कैंप चला गया था, जब उसे कोई समझ नहीं थी। यह बातें टुगे की सबसे बड़ी भाभी मिड़को ने बताई, जब शव लेने कांकेर पहुंची। उनको नहीं पता था कि उस पर 10 लाख का ईनाम भी घोषित था।
हिदूर के जंगल में हुई पुलिस नक्सली मुठभेड़ में तीन मार्च को पुलिस की गोली का शिकार हुआ, जिसमें टुगे यानी नागेश की मौत हो गई थी। पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम करवाकर मोर्चरी में रखा था और उसके शव को लेने के लिए उसके गांव नारायणपुर जिले के ग्राम पंचायत कोतुल के आश्रित ग्राम कुडेलियार से भाभी मिड़को, भतीजा मैनूराम उसेंडी, भतीजी बसंती, पड़ोसिन सोनाय, मामा सुनील और सुखराम पांच मार्च की देर शाम नारायणपुर थाना पहुंचे थे और सात मार्च की सुबह 10 बजे के आसपास कांकेर थाना पहुंचे। इसमें केवल मैनूराम उसेंडी ही हिंदी समझता था, क्योकि अभी कोहकामेटा में कक्षा नौंवी का छात्र है। वहीं, अन्य सभी सदस्य केवल गौंडी ही जानते थे। इनके साथ वाहन का चालक था, जो हिंदी और गौंडी दोनो भाषा जानता था।
मृतक नक्सली टिगू की भाभी एवं भतीजा मैनूराम ने बताया कि यह पांच भाई थे, जिसमें यह सबसे छोटा था। इनके माता व पिता की मृत्यु जब हो गई थी, तब टिगू बहुत छोटा था। भाभी के घर में ही रहकर खाता था, परंतु गुस्सा बहुत जल्द हो जाता था। छोटी-छोटी बातों को लेकर झगड़ता रहता था और एक दिन गुस्से में आकर झगड़कर पास के गांव में लगे नक्सलियों के कैंप में चला गया और तब से आज तक कभी गांव वापस नहीं आया। नक्सलियों के साथ जब गया, तब उसकी उम्र ज्यादा नहीं थी। यहां तक नौंवी में पढ़ने वाला भतीजा मैनूराम का जन्म भी नहीं हुआ था।