पंजाब के सीएम भगवंत मान ने रिश्वतखोरी को खत्म करने के लिए जंग की घोषणा की है लेकिन पुलिस विभाग के बीमार सिस्टम से कैसे भ्रष्टाचार खत्म होगा, यह एक बड़ी चुनौती है। जमीनी स्तर पर हालात ये हैं कि थानेदार को महज 33 रुपये का पेट्रोल या डीजल रोजाना मिलता है। इसमें आधा लीटर पेट्रोल या डीजल नहीं आ सकता।
वहीं सिपाही, हेड कांस्टेबल व हवलदार को औसतन 23 रुपये मिलते हैं, क्या मौजूदा वक्त में 33 रुपये में रोजाना पेट्रोल डीजल फूंककर थानेदार या पुलिस मुलाजिम काम कर सकते हैं। अब थाना स्तर से चर्चा शुरू होकर पुलिस अधिकारियों के केबिन तक पहुंच गई है। यही नहीं एक केस दर्जकर अदालत में चालान पेश करने तक जेब से करीब पांच से 10 हजार रुपये राशि खर्च होती है। इसमें स्टेशनरी से लेकर चालान पास करवाने तक की प्रक्रिया शामिल है लेकिन सरकार से कुछ नहीं मिलता है।
हालात ये हैं कि एक थाने में एक गाड़ी है और इसे एसएचओ इस्तेमाल करते हैं। पांच लीटर डीजल थानेदार के इस वाहन को रोजाना मिलता है, जिसमें उसे पूरा दिन चलाना है। इसके लिए बकायदा लॉग बुक लगी होती है। अनुशासन फोर्स होने के कारण पुलिस मुलाजिम खुलकर बोलने को तैयार नहीं हैं, लेकिन उनका कहना है कि एक मामला दर्ज करने के बाद उसकी जांच के लिए कई बार मौके पर जाना पड़ता है, कई बार अपराधी की धरपकड़ के लिए दूसरे जिले या प्रदेश में जाना पड़ता है तो क्या 23 या 33 रुपये के रोजाना पेट्रोल या डीजल से यह संभव है?
एक एसआई ने अपना नाम न छापने की शर्त पर बताया कि एक मामला दर्ज कर अदालत में चालान पेश करने तक जेब से 5 से 10 हजार के करीब की राशि खर्च होती है? इसमें स्टेशनरी से लेकर चालान पास करवाने तक की प्रक्रिया शामिल है। स्टेशनरी के लिए फूटी कौड़ी सरकार की तरफ से नहीं मिलती। जिमनी लिखने के लिए स्टेशनरी की जरूरत होती है, एक-एक फाइल में 50 से अधिक पेज लग जाते हैं, कौन खर्च करेगा? थाने में एएसआई और एसआई समेत बाकी कर्मचारियों को वाहन की सुविधा नहीं है, इसलिए सरकारी ड्यूटी के दौरान मौके पर पहुंचने के लिए उन्हें निजी खर्च करना पड़ता है। ऐसे में अपनी जेब से निकले पैसे पूरे करने के लिए पुलिसवाले लोगों की जेबों से पैसे निकालने को मजबूर हैं।
थानों में कागज-पत्रों की कार्रवाई के दौरान आने वाला स्टेशनरी का खर्च, कंप्यूटर का खर्च, टोनर रिफिलिंग, थाने की इमारत की मरम्मत और रंग-रोगन का खर्च, पुलिसकर्मियों के लिए रसोई का खर्च और अन्य जरूरी खर्च पुलिस को निजी तौर पर करने पड़ते हैं। इनकी पूर्ति बाद में जनता की जेब से सीधे या टेढ़े तरीके से की जाती है।
लवारिस लाश मिलने पर एएसआई की जेब हो जाती है ढीली
अगर कोई लावारिस लाश मिलती है तो उसकी पोस्टमार्टम प्रक्रिया से लेकर संस्कार तक का खर्च एक थानेदार को अपनी जेब से करना पड़ता है। 174 की धारा के तहत कार्रवाई, शव गृह में शव का रखरखाव, शव को शमशान घाट तक पहुंचाना, संस्कार करवाना, सब कुछ जांच करने वाले मुलाजिम को जेब से खर्च करना पड़ता है।