राष्ट्रपति से सम्मान लेते धर्मवीर सिंह।
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मूल रूप से जिला रोपड़ के गांव खैराबाद में पैदा हुए ध्यान चंद अवार्ड विजेता धर्मवीर सिंह ने इस मुकाम तक पहुंचने के लिए बचपन से ही जद्दोजहद शुरू कर दी थी। दोस्त की हॉकी स्टिक मांगकर सफर शुरू करने से लेकर वर्ल्ड हॉकी लीग, एशियन गेम्स, कॉमनवेल्थ गेम्स एवं ओलंपिक गेम्स जैसे कई हॉकी टूर्नामेंट में हिस्सा लेकर गोल्ड, रजत एवं कांस्य से जैसे कई पदक जीत चुके हैं।
धर्मवीर सिंह एक सामान्य किसान परिवार में अगस्त 1990 में पैदा हुए थे। करीब 10 साल की उम्र में उन्होंने पहली बार जालंधर स्थित एक स्पोर्ट्स कांप्लेक्स में अपने दोस्त की हॉकी स्टिक मांगकर ट्रायल दिया था लेकिन उसमें उन्हें सफलता नहीं मिली थी। एक बार फिर 12 साल की उम्र में सन 2002 में धर्मवीर सिंह को चंडीगढ़ एकेडमी का ट्रायल देने का मौका मिला था। उस समय उनके पास जाने के लिए पैसे नहीं थे। परंतु उन्होंने इस बार भी हिम्मत नहीं हारी।
अपने 4 पालतू कबूतरों को करीब 300 में बेच कर आने जाने का किराया जुटाया और ट्रायल दिया। इस बार उनकी मेहनत एवं किस्मत ने उनका साथ दिया। चंडीगढ़ एकेडमी के लिए उनका चयन हो गया। उसके बाद से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कड़ी मेहनत से ध्यानचंद अवार्ड तक का सफर तय किया।
खुद को लगी गोली तो ठाना पुलिस में भर्ती होने का
2011 में हुई एक घटना के बाद उन्होंने पुलिस में भर्ती होने का फैसला किया था। लुटेरों ने उन्हें गोली मारकर, उनकी कार छीन ली थी। जिसके बाद वह पुलिस थाने के लगातार चक्कर लगाते रहे। लेकिन पुलिस के रवैए को देखकर उनके मन को एक ठेस पहुंची और उसके बाद कभी भी अपनी वारदात को लेकर कोई पैरवी नहीं की।
हॉकी में नाम कमाने के बाद जब वह पंजाब पुलिस में भर्ती हुए, तो उन्होंने पुलिस के इस रवैया को ठीक करने के लिए बहुत कुछ किया है। वह चाहते हैं कि अगर किसी भी पुलिस अधिकारी के पास कोई व्यक्ति समस्या लेकर आता है तो उसके साथ प्यार से बात की जाए। ताकि उसकी आधी समस्या ऐसे ही दूर हो जाए।