जेएलएन (जवाहरलाल नेहरू फीडर) नहर का पानी पीते समय मुझे अमृत से कम नहीं लगता, क्योंकि मैंने छह पैसे रोज की मजदूरी पर इसकी खुदाई की थी। लगभग एक हजार लोगों ने 92-93 दिन में 30 किलोमीटर नहर खोदी। पुरुष खुदाई करते थे और महिलाएं कांधा कस्सी टोकरी छह पैसे की नौकरी... आदि गीत गाती थीं। जब पहली दफा नहर में पानी आया तो रोहतक में जश्न का माहौल था।
कई दिनों तक जगह-जगह महिलाएं गाने गाकर नृत्य करती थीं। उन दिनों को याद करके 103 साल के कंवर सिंह की आंखों में चमक और शरीर में स्फूर्ति दौड़ पड़ती है। जर्जर काया कंवर सिंह तेजी से मुस्कराते हुए लेटे से बैठ जाते हैं और अमर उजाला से गुजरे जमाने को बयां करने लगते हैं। झज्जर चुंगी निवासी कंवर सिंह जनपद के सबसे ज्यादा बुजुर्ग हैं। उनका जन्म निठाऊ सोनीपत में 1915 में वीर सिंह के सबसे बड़े पुत्र के रूप में हुआ था।
वह अंग्रेजी हुकूमत की दुश्वारियों, देश की आजादी के जश्न, अकाल में एक-एक रोटी के लिए मचे हाहाकार के साक्षी है। वह बताते हैं कि 1966 में अकाल पड़ा था, मगर उसका हरियाणा में असर थोड़ा था। जब 1969 में अकाल पड़ा तो सबसे ज्यादा प्रभावित राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, उप्र. तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक राज्य हुए। इन राज्यों के लोग एक-एक रोटी के लिए तरस गए थे। वह बताते हैं कि अकाल की सबसे बड़ी वजह पानी की कोई समुचित व्यवस्था न होना था। भविष्य में दोबारा से अकाल के हालात पैदा न हो, इससे निपटने के लिए तत्कालीन सरकार ने रोहतक में जनता की प्यास बुझाने के लिए नदी लाने की योजना बनाई।
जनता ने दिया था पूरा सहयोग
जेएलएन नहर
तत्कालीन मंत्री सर छोटूराम ने रोहतकवासियों से अपील करते हुए कहा था कि यदि वह साथ दें तो हमेशा-हमेशा के लिए रोहतक को पानी की किल्लत से मुक्ति मिल सकती है जिस पर जनता ने सहयोग का पूरा आश्वासन दिया। सर छोटू राम की अपील पर रोहतक के करीब एक हजार लोगों ने अपनी खेतीबाड़ी परिवार पर छोड़ दी और नहर की खुदाई करने का फैसला लिया।
इसके लिए सरकार ने छह पैसा हर रोज मेहनताना के रूप में देना तय किया। वह बताते हैं कि नहर की खुदाई के काम के चलते मैंने तीन माह तक अपनी खेती नहीं की। बस सुबह आठ बजे घर से फावड़ा (कस्सी) और रोटी लेकर निकल जाता था और शाम पांच बजे तक खुदाई करता।
बच्चे, बूढ़े और जवान, सभी पहुंचे नहर के पास
कंवर सिंह बताते हैं कि जिस दिन नहर में पानी आया, उस समय पूरे रोहतक में उत्सव जैसा माहौल था। रोहतक में कोई भी पुरुष-स्त्री और बच्चा ऐसा नहीं था, जो नहर के किनारे नहीं खड़ा हो। कोई पूजा अर्चना कर रहा था तो कोई बार-बार नहर का पानी पीकर उसका गुणगान कर रहा था। बच्चों ने तो नहर में खूब अठखेलियां कीं। वह वर्तमान निर्माण व्यवस्था पर चोट करते हुए कहते हैं कि पता नहीं कि अब कैसे और किस तरह से काम होता है? वह बताते हैं कि 92-93 दिन के अंदर करीब एक हजार लोगों ने 30 किलोमीटर नहर की खुदाई कर दी। वह कहते हैं कि इतना काम आज सालों में पूरा हो पाता है।
ये है मेरी लंबी उम्र का राज
कंवर सिंह बताते हैं कि जब मैं युवा था, तब सुबह बाजरा की खिचड़ी और लोटा भर मट्ठा (लस्सी) सुबह खाता था। दोपहर और शाम को घी और दूध से ही रोटी खाता। दिनभर खेत पर काम करता। हां, मैंने कभी भी कोई नशा नहीं किया। जब उम्र के पड़ाव पर आया और बड़ा बेटा साथ हाथ बंटाने लगा तो सुबह और शाम का दौड़ना और घूमना शुरू कर दिया। हां, जिंदगी में काफी मुसीबत आईं, मगर कभी भी फिक्र नहीं की। सब कुछ भगवान पर छोड़ दिया और समय अच्छी तरह से गुजरता चला गया। आज भी सुबह छह-सात बजे चारपाई छोड़कर करीब तीन बजे टहलने निकल जाता हूं।