देश की जानी-मानी भरतनाट्यम नृत्यांगना डॉ. सरोजा वैद्यनाथन 86 साल की उम्र में भी शानदार नृत्य करती है। चंडीगढ़ सेक्टर-30 स्थित भारती भवन में आदि शंकराचार्य जयंती महोत्सव में भाग लेने पहुंची डॉ. वैद्यनाथन ने आदि शंकराचार्य और मंडल मिश्र के बीच हुए शास्त्रार्थ को भरतनाट्यम के माध्यम से मंच पर प्रस्तुत किया।
वे कहती हैं कि मेरा जन्म भरतनाट्यम के लिए ही हुआ है। घरवाले मुझे डॉक्टर और इंजीनियर बनाने में लगे थे, कई बार समझाया कि जीवन बर्बाद मत करो लेकिन मैं तो नृत्य सीखना चाहती थी। जब सात वर्ष की उम्र में चेन्नई में घर के बरामदे में मां के सामने लोट-लोट कर नृत्य सीखने की जिद कर रही थी। नृत्य के प्रति मेरी जिद ने मुझे शिखर तक पहुंचा दिया।
अमर उजाला से खास बातचीत में उन्होंने बताया कि जब वह मां के सामने बरामदे में लोटकर नृत्य सीखने की जिद कर रही थीं तब घर के लोगों ने कहा ठीक है, बच्ची है। नाना ने मां से कहा दो चार वर्ष सीखने दो फिर समझदार हो जाएगी। उसके बाद चेन्नई स्थित सरस्वती गान निलयम में उनका नामांकन हुआ। उनकी गुरु ललिता ने उन्हें नृत्य सिखाना शुरू कर दिया। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की कविता पर किया था नृत्य
उम्र के इस पड़ाव में भी शानदार नृत्य करती हैं। उन्हें 2003 में पद्मश्री और वर्ष 2012 में पद्म भूषण से नवाजा गया। वर्ष 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ सात देशों की यात्रा की। वाजपेयी की कविता पर भरतनाट्यम की प्रस्तुति दी। उनमें से एक कविता हम जंग नहीं होने देंगे सहित अन्य कविताओं पर भी उन्होंने भरतनाट्यम किया।
सितारा देवी और बिरजू महाराज ने दिखाई दरियादिली
डॉ. सरोजा वैद्यनाथन ने बताया कि वर्ष 1972 में उनके पति भागलपुर में तैनात थे। वहां के लोगों के पास संगीत के लिए भवन नहीं था। लोगों ने कहा कि पैसे नहीं हैं इसलिए भवन नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए उन्होंने तीन दिनों का संगीत कार्यक्रम रखा। देश के नामी कलाकारों को बुलाया। इसमें सितारा देवी, रोशन कुमारी, चंद्रशेखर जैसे दिग्गज कलाकार शामिल थे, सभी ने प्रस्तुति दी। सितारा देवी और बिरजू महाराज ने जब यह बात सुनी कि यह कार्यक्रम भवन बनाने के लिए किया गया है तो उन्होंने अपने 10-10 हजार रुपये में से पांच-पांच लौटा दिए। वहां पर बड़ा भवन बन गया तब कार्यक्रम से दो लाख रुपये प्राप्त हुए थे। उनके पति बिहार कैडर के आईएएस अधिकारी थे। वह वर्ष 1956 से लेकर 72 तक बिहार में रहे।
बिहार से दिल्ली आ गईं, खोला गणेश नाट्यालय
बिहार से 1972 में ही डॉ. सरोजा दिल्ली आई गईं और वहां पर गणेश नाट्यालय खोला। आज 15 देशों में उनके स्कूल हैं। उनके शिष्य भी अब गुरु बनकर स्कूल चला रहे हैं। उन्होंने चार किताबें भी लिखीं हैं। दो किताबें खुद के नृत्य के सफर के बारे में, तीसरी किताब भारत के पारंपरिक नृत्य और चौथी संगीत के बारे में है।