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Dr. Shobha Kausar: कथक को साधना मानती हैं शोभा कौसर, बहन का सुहाग उजड़ने के दर्द के साथ भी दी थी प्रस्तुति

Mon, 24 Apr 2023 03:29 PM IST
निवेदिता वर्मा शशिभूषण पुरोहित, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

एक दौर था जब बेटियों के घर से बाहर निकलने पर मनाही थी। शोभा उस वक्त पांच वर्ष की थीं। बकौल शोभा कौसर- हम सात भाई-बहन थे। मां की संगीत और साहित्य में रुचि थी तो उन्होंने मुझे नृत्य की कक्षा में भेजना शुरू किया और अन्य भाई बहनों को अलग विधा में लगा दिया।
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डॉ. शोभा कौसर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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देश और विदेश में अपनी प्रतिभा की छाप छोड़ने वाली विख्यात कथक नृत्यांगना डॉ. शोभा कौसर ने अपने पति स्वर्गीय एमएल कौसर के साथ मिलकर चंडीगढ़ में प्राचीन कला केंद्र की स्थापना की थी। आज इस संस्थान की आज देश-विदेश में लगभग 700 शाखाएं हैं। 
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डॉ. शोभा कौसर जयपुर घराने से आती हैं और उन्होंने नृत्य कला की विधिवत शिक्षा अपने गुरु कन्हैया लाल और कुंदन लाल गंगानी से ली है। वह प्रसार भारती की शीर्ष कलाकार भी रही हैं। संगीत नाटक अकादमी के राष्ट्रीय पुरस्कार सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित 80 वर्षीया डॉ. शोभा कौसर ने अमर उजाला से विशेष बातचीत की और अपने जीवन से जुड़ा एक भावुक वाकया साझा किया। 

बहन की चूड़ियां उतर रहीं थी, मैं प्रस्तुति के लिए श्रृंगार कर रही थी
डॉ. कौसर ने बताया कि 2001 में कुआलालंपुर की एक शाम कार्यशाला के लिए मंच सज चुका था। मुझे जटायु मोक्ष पर सुबह कथक की प्रस्तुति देनी थी, लेकिन पति एमएल कौसर का चेहरा उतरा हुआ था। उन्हें इस तरह देख कुछ चिंता हुई, मैं रिहर्सल करती रही। देर रात पति ने बताया कि पंजाब के मोगा में मेरी बहन आभा के पति नहीं रहे। मन किया कि सब छोड़छाड़ कर वापस चलते हैं, लेकिन आयोजकों ने कहा कि अब कुछ नहीं किया जा सकता। सभी को निमंत्रण दिए जा चुके हैं। सुबह ऑडिटोरियम में दर्शक जुट जाएंगे। अगली सुबह पंजाब में मेरी बहन की चूड़ियां उतर रहीं थीं और इधर मैं मंच पर प्रस्तुति देने के लिए श्रृंगार कर रही थी। उस प्रस्तुति के दौरान मेरी आंखों से आंसू बह रहे और पैर थिरकते जा रहे थे और सामने बैठे दर्शक तालियां बजा रहे थे।
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पांच वर्ष की उम्र से शुरू किया था कथक, पिता को नहीं था पसंद
एक दौर था जब बेटियों के घर से बाहर निकलने पर मनाही थी। शोभा उस वक्त पांच वर्ष की थीं। बकौल शोभा कौसर- हम सात भाई-बहन थे। मां की संगीत और साहित्य में रुचि थी तो उन्होंने मुझे नृत्य की कक्षा में भेजना शुरू किया और अन्य भाई बहनों को अलग विधा में लगा दिया। पिता डॉ. चंद्रबल सूद क्षेत्र के जाने माने डॉक्टर थे। उन्हें संगीत और नृत्य में रुचि नहीं थी तो मां रामकली को डांटते कि बच्चों का भविष्य खराब क्यों कर रही हो लेकिन कुछ समय बाद गुरु जी ने घर आकर कहा कि इस बच्ची में कुछ अलग बात है इसलिए वह शोभा को घर आकर सिखाना चाहते हैं। 11 साल की उम्र में शोभा को मुंबई में पहली बार प्रस्तुति देने का मौका मिला। वह बताती हैं कि मेरी नृत्य में रुचि को देखते हुए पिता भी धीरे-धीरे मुझे मानने और उत्साहित करने लगे।

कैंसर से जीती जंग, शाम होते ही पहन लेतीं हैं घुंघरू
शोभा कौसर को उस वक्त बड़ा झटका लगा जब डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें कैंसर है। पहले तो वह घबरा गईं। 21 रेडिएशन के बाद उनकी सेहत में सुधार हुआ और कैंसर से जंग जीत ली। 80 की उम्र में भी शोभा कौसर रोज रियाज करती हैं। शाम सात बजते ही वह पैरों में घुंघरू बांध लेतीं हैं और तबले के साथ नृत्य करती हैं। डॉ. कौसर ने कहा कि कैंसर जैसे रोग से बचा जा सकता है। बशर्ते इसका समय रहते इलाज शुरू हो जाए और दृढ़ इच्छा शक्ति हो।

नृत्य विधा में उज्जवल भविष्य, बच्चों को आगे लाएं अभिभावक
भारतीय शास्त्रीय नृत्य कला में पीयू से स्नातक, स्नातकोत्तर ओर उसके बाद आगरा यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर चुकीं डॉ. शोभा कौसर लगभग 40 साल तक संगीत की शिक्षक के तौर पर सेवाएं दे चुकी हैं। उन्होंने कहा कि आज विभिन्न नृत्य अकादमियां खुल जाने से नृत्य विधा में शानदार कॅरिअर है। अभिभावक बच्चों को बेझिझक आगे लाएं और उनका शौक पूरा करें। शोभा कौसर ने नृत्य अभिज्ञान के नाम से दो पुस्तकें भी लिखीं हैं। वह कहती हैं कि नृत्य एक ईश्वरीय कला है। शास्त्रीयता को लेकर चलें तो श्रद्धा, विश्वास और मेहनत..बहुत कुछ चाहिए। वास्तव में यह एक साधना है, जिसमें शुद्धता बची रहनी चाहिए। यह तभी संभव है जब सीखने वाले का पूरी वफादारी से कला के साथ जुड़ाव हो।

चंडीगढ़ से जगन्नाथ पुरी तक के सफर में खोले केंद्र
डॉ. शोभा कौसर ने बताया कि कला क्षेत्र से जुड़े उनके पति दिवंगत एमएल कौसर और उन्होंने 1970 में एक कार में चंडीगढ़ से जगन्नाथ पुरी तक की यात्रा की और रास्ते में कई संस्थानों की नींव रखी। आज देश-विदेश में ऐसे 700 कला केंद्र हैं, जो चंडीगढ़ प्राचीन कलाकेंद्र से जुड़े हैं। डॉ. कौसर संगीत और नाट्य विधा में पंजाब यूनिवर्सिटी से मान्यता प्राप्त कोर्स का संचालन करती हैं, जिनके तहत प्रारंभिक, भूषण, विशारद और भास्कर की डिग्री प्रदान की जाती है। उन्होंने बताया कि प्राचीन कलाकेंद्र की विभिन्न शाखाओं में इस बार 3 लाख 24 हजार विद्यार्थी अपीयर हुए हैं। लगभग 20,000 और शिक्षार्थियों के जुड़ने की उम्मीद है।

डॉ. कौसर के नाम ये पुरस्कार
  • संगीत नाटक अकादमी अवार्ड, भारत सरकार
  • संगीत नाटक अकादमी अवार्ड, पंजाब सरकार
  • नृत्य श्री
  • नृत्य सुरभि
  • नृत्य उर्वशी
  • नृत्य शारदा
  • श्रीक्षेत्र नाटी
  • अभिनय साम्राज्ञी
  • आमला शंकर अवार्ड
  • पंडित मनमोहन भट्ट यादगार पुरस्कार
  • के ललिता लाईफ टाईम अचीवमेंट अवार्ड
  • कोणार्क इंटरनेशनल अवार्ड
  • कला शिरोमणि अवार्ड, मद्रास संगीत नाटक अकादमी
  • सीसीआई अवार्ड
  • नृत्य मार्तंड अवार्ड, नुपुर डांस अकादमी यूएसए
  • पंडित सदाशिव राव जाधव अवार्ड
  • कृष्ण गौरव पुरस्कार
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