देश में बने इस सिस्टम के तहत निर्मित अस्थायी पुलों से सेना के भारी भरकम टैंकर और अन्य भारी वाहक गुजारे जा सकते हैं। सेना की चंडीगढ़ सहित अन्य इंजीनियरिंग शाखाओं में ये उत्पाद पहुंचाए जाने लगे हैं।
रक्षा अनुसंधान व विकास संगठन (डीआरडीओ) की ओर से डिजाइन और विकसित शॉर्ट स्पैन ब्रिजिंग सिस्टम (एसएसबीएस) से सेना की विदेशों पर निर्भरता खत्म हो गई है। कुछ ही घंटों में 300 मीटर तक लंबा और चार मीटर चौड़ा पुल तैयार करने के लिए अब देश में ही सामान बनने लगा है।
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पहले इसके स्पेयर पार्ट्स रूस और चेकोस्लोवाकिया से आयात किए जाते थे, लेकिन अब डीआरडीओ के सहयोग से देश में ही एलएंडटी कंपनी इसका निर्माण कर रही है। खास बात यह है कि भारतीय सेना इन उत्पादों को एमएसएमई के तहत खरीदने की तैयारी कर रही है ताकि मध्यम और लघु उद्योगों की आर्थिकी भी सुदृढ़ रहे।
शॉर्ट स्पैन ब्रिजिंग सिस्टम डीआरडीओ इंजीनियरिंग लैब के रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट विंग की ओर से तैयार किया गया है। जीरकपुर स्थित खड़का सैपर्स इंजीनियर ब्रिगेड में प्रशिक्षण के लिए सेना स्वदेशी उत्पादों का इस्तेमाल कर रही है। ब्रिगेड के कर्नल धीरज पोहड़ ने बताया कि आत्मनिर्भर भारत के तहत अब सेना कई चीजों के लिए विदेशों पर निर्भर नहीं रही है। ड्रोन से लेकर शॉट स्पैन ब्रिजिंग सिस्टम तक भारत में बनने लगे हैं। उन्होंने बताया कि देश में बने इस सिस्टम के तहत निर्मित अस्थायी पुलों से सेना के भारी भरकम टैंकर और अन्य भारी वाहक गुजारे जा सकते हैं। सेना की चंडीगढ़ सहित अन्य इंजीनियरिंग शाखाओं में ये उत्पाद पहुंचाए जाने लगे हैं।
क्या है एसएसबीएस और कैसे करता है काम
डीआरडीओ की प्रमुख इंजीनियरिंग प्रयोगशाला, अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान (इंजीनियरिंग) पुणे ने मेसर्स एलएंडटी लिमिटेड के सहयोग से इस प्रणाली को डिजाइन और विकसित किया है। इनका प्रयोग सेना युद्ध के दौरान आर्मर टैंकों समेत अन्य सैन्य वाहनों की आवाजाही के लिए करती है। साथ ही आपदाग्रस्त इलाकों में भी सेना द्वारा इस तरह के पुल बनाए जाते हैं। इस प्रणाली से सैनिकों की त्वरित आवाजाही में मदद के साथ संसाधनों की गतिशीलता बढ़ी है। डीआरडीओ के पास मिलिट्री ब्रिजिंग सिस्टम जैसे महत्वपूर्ण कॉम्बैट इंजीनियरिंग सिस्टम विकसित करने का व्यापक अनुभव है।