जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हुई हिंसा व तोड़फोड़ मामले में दर्ज मामलों में से 407 वापिस लेने की हरियाणा सरकार की तैयारियों पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश से पानी फिर गया है। हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार को आदेश दिया है कि केस वापस लेने की प्रक्रिया को सरकार आगे न बढ़ाए।
साथ ही प्रदेश के सभी मजिस्ट्रेट को आदेश दिए हैं कि जाट आरक्षण से जुड़े किसी भी केस में कैंसिलेशन रिपोर्ट या केस वापस लेने की सरकार की अर्जी पर फैसला न लिया जाए। जाट आंदोलन के दौरान बड़े पैमाने में हुई तोड़फोड़, हिंसा और आगजनी के चलते हरियाणा पुलिस ने 2015 एफआईआर दर्ज की थी।
इनमें से 407 एफआईआर को वापस लेने का हरियाणा सरकार ने फैसला लिया था। जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हुई हिंसा को लेकर हाईकोर्ट ने संज्ञान लेकर सुनवाई आरंभ की थी। चीफ जस्टिस कृष्ण मुरारी एवं जस्टिस अरुण पल्ली की खंडपीठ के समक्ष बुधवार को दो घंटे बहस चली। इस दौरानकोर्ट ने निर्धारित किया कि इस केस में बहुत सारे मुद्दे हैं इसलिए इनको चार हिस्सों में बांट दिया गया।
पहला मूनक कनाल के साथ हुई तोड़फोड़ का मामला जिसकी जांच सीबीआई को सौंपी जा चुकी है। दूसरा मुरथल गैंग रेप का मामला, तीसरा जाट आंदोलन के दौरान हुई हिंसा-तोड़फोड़ और आगजनी का और चौथा दर्ज की गयी एफआईआर वापस लेने और एफआईआर पर कैंसिलेशन रिपोर्ट दायर करने का।
जाट वोटरों को साधने की मंशा
बुधवार को सुनवाई के दौरान गुप्ता ने हाईकोर्ट को बताया कि हरियाणा सरकार शांति और सौहार्द का बहाना बना हिंसा, तोड़फोड़ और आगजनी के 2015 मामलों में से 407 केस वापस लेने की तैयारी कर रही है। गुप्ता ने बताया कि प्रकाश सिंह कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में इन 407 मामलों में से 129 को बेहद ही गंभीर मामला बताया है। बावजूद इसके सरकार की मंशा आरोपियों को बचाने की है ताकि जाट वोटरों को साध सके।