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भारतीय सेना ने दिया शहीद का दर्जा, लेकिन शहादत ही नकार रही पंजाब सरकार

Fri, 02 Oct 2020 12:49 AM IST
खुशबू गोयल नवनीत छिब्बर, मोहाली
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शहीद के प्रमाण पत्र - फोटो : अमर उजाला
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शहीदों के परिवारों को सियासी वादे मिलते हैं, सरकारी नौकरी नहीं। नौकरी देने के वक्त शहीद की शहादत को ही नकार दिया जाता है। वो भी उस राज्य में जहां के सैनिकों ने दुनिया भर में अपनी बहादुरी का लोहा मनवाया है और मुख्यमंत्री खुद पूर्व सैन्य अधिकारी भी हैं। यह मामला अकेले शहीद सुखदेव सिंह के बेटे को नौकरी दिए जाने का ही नहीं है।
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यह मामला राज्य सरकार के रिकॉर्ड में शहादत को नकारे जाने का भी है। दो बार के एशियाई गोल्ड मेडलिस्ट एथलीट एवं पूर्व सैनिक के बेटे तक को नौकरी नहीं मिल पा रही है। होशियारपुर जिले की तहसील दसूहा के गांव मयाणी के सुखदेव सिंह सिख लाइट रेजिमेंट में सिपाही थे। जो ऑपरेशन रक्षक के दौरान जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों के साथ मुडभेड़ में शहीद हुए थे। आर्मी के रिकॉर्ड और सबसे अहम आर्मी चीफ की ओर से शहीद सुखदेव सिंह को दिया गया बैज ऑफ सैक्रीफाइज, उनकी शहादत को साबित करता है।

वहीं, डायरेक्टर रिटायर्ड बिग्रेडियर सतिंदर सिंह की मानें तो राज्य सैनिक कल्याण बोर्ड के रिकार्ड में सुखदेव सिंह शहीद नहीं हैं। उनकी मौत दिल का दौरा पड़ने के कारण हुई है। इससे साफ है कि राज्य सरकार के रिकार्ड में शहीदों का रिकार्ड सही ढंग से नहीं रखा जा रहा। जबकि सुखदेव सिंह को शहीद साबित करने के लिए कई दस्तावेज मौजूद हैं। जिनमें सबसे अहम है। सिपाही सुखदेव सिंह की सर्विस बुक, जो कि इसका अहम दस्तावेज है। जिसमें उनकी मौत का कारण साफ दर्ज है।
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राज्य सरकार का रिकॉर्ड उन्हें शहीद नहीं मानता

आर्मी के रिकॉर्ड के अनुसार मौत का कारण आतंकवादियों के साथ मुड़भेड़ है। इसी तरह शहीद सुखदेव सिंह की विधवा सर्बजीत कौर को भी युद्ध में विधवा माना गया है। जिसका अहम दस्तावेज सर्बजीत कौर के लिए जारी पीपीओ बुक यानी पेंशन पेय ऑर्डर बुक है। जिसके नंबर में बीसी दर्ज किया गया है। बीसी यानी बैटल कैज्युल्टी जिसका अर्थ है युद्ध में मौत।

शहीद सुखदेव सिंह की शहादत को साबित करता है आर्मी चीफ द्वारा उन्हें दिया गया बैज ऑफ सैक्रीफाइज। 16 दिसंबर, 1999 को देश के तत्कालीन थल सेना अध्यक्ष जनरल वेद मलिक ने शहीद सुखदेव सिंह के लिए बैज ऑफ सैक्रीफाइज साइन किया था। यह एक प्रमाण पत्र है, जो युद्ध और आर्मी आप्रेशन्स के दौरान शहीद होने वाले सैनिकों को दिया जाता है।

इसमें साफ साफ दर्ज है कि ऑप्रेशन रक्षक के दौरान सिपाही सुखदेव सिंह ने आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। इतना सब होने के बावजूद राज्य सरकार का रिकॉर्ड उन्हें शहीद नहीं मानता। 1995 में जब सिपाही सुखदेव सिंह शहीद हुए तब उनके बेटे दविंदर सिंह की उम्र महज एक साल थी। अब तीन साल से वो चतुर्थ श्रेणी में नौकरी मांग रहा है।

एक्स सर्विसमैन ग्रिवियन्स सैल नामक एनजीओ ने उठाई जिम्मेदारी

अब इस मामले को उठाने को जिम्मेदारी ली है, एक्स सर्विसमैन ग्रिवियन्स सैल नामक एक एनजीओ ने। जिसके प्रेजीडेंट रिटायर्ड ले. कर्नल केके सोही है। कर्नल सोही पहले भी शहीदों और पूर्व सैनिकों के सर्विस रिकार्ड से जुड़ी खामियों के मामले हल करवा चुके हैं। कर्नल सोही बताते हैं कि शहीदों के ही नहीं पूर्व सैनिकों के परिवार के लिए जिसमें पूर्व सैनिक खुद भी शामिल हैं, को राज्य सरकार की तरफ से सरकारी नौकरियों में 13 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने का प्रावधान है। कर्नल सोही का कहना है कि यह व्यवस्था कई दशकों से चली आ रही है।

वह बताते हैं कि पहले 14 आरक्षण दिया जाता था, करीब 15 साल पहले इसे घटाकर 13 प्रतिशत कर दिया गया था। कर्नल सोही कहते हैं कि रिकॉर्ड देखने पर पता चलता है कि न सिर्फ शहीदों के परिवारों को बल्कि पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों को भी अपने आरक्षित हिस्से की नौकरियों में से सिर्फ 1.5 प्रतिशत हिस्सा ही मिल रहा है। सरकार इस कोटे में नौकरियां दे ही नहीं रही। उन्होंने कहा कि रिकॉर्ड में कहीं न कहीं कमी है, जिसे ठीक किया जाना चाहिए। उन्होंने ऐसे कुछ मामले भी उठाए।
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संगरूर जिले गांव भट्ठल में भी ऐसा ही एक मामला

ऐसा ही एक मामला पंजाब की पूर्व कांग्रेसी सीएम राजिंदर कौर भट्ठल के गांव का है। संगरूर जिले के गांव भट्ठल के हाकम सिंह सिख रेजिमेंट-6 में हवलदार के पद पर तैनात थे। हाकम सिंह एथलीट थे और उन्होंने 1969 और 71 के एशियाई खेलों में लंबी चाल में देश के लिए स्वर्ण पदक जीता।

उनके देहांत के बाद उनके बेटे मनप्रीत सिंह ने 2018-19 में खेल मंत्रालय में आरक्षित कोटे के तहत नौकरी के लिए आवेदन किया। मनप्रीत खेल मंत्रालय में नौकरी के लिए पूर्व सीएम राजिंदर कौर भट्ठल के पत्र के साथ खेल मंत्री राणा सोढी के पास गए। कर्नल सोही बताते हैं कि खेल मंत्री सेदस दिन तक मिलने के लिए जाते रहे, लेकिन उन्होंने समय नहीं दिया।
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