पंजाब में इस बार विधानसभा चुनाव पिछले कई चुनाव से अलग होंगे। पहले जो होता रहा है, वह इस चुनाव में नहीं होगा। इसका असर अब सियासी गुणा गणित में भी दिखने लगा है। बदलाव की शुरुआत जट सिख वोट बैंक से हो गई है। हमेशा से चुनाव की धुरी रहने वाले जट सिख वोट को सियासी दल साधते नजर आते थे, लेकिन इस बार सियासी दल पुश्तैनी सियासत को छोड़ दलित और हिंदू वोट बैंक को साधने में लगे हुए हैं।
अब तक पंजाब की सियासत 20 फीसदी वाले जट सिखों के इर्द-गिर्द ही सिमटी रही है। यहां तक कि सभी मुख्यमंत्री जट सिख समुदाय से ही बनते रहे है। आबादी में 32 फीसदी हिस्सेदारी के बाद भी दलित मुख्यमंत्री की चर्चा अब से पहले कभी नहीं हुई। ये भी दीगर बात है कि 117 सदस्यों वाली पंजाब विधानसभा में 34 सीटें आरक्षित हैं। हालांकि मतदाता के तौर पर दलित समुदाय का असर पंजाब विधानसभा की करीब 50 सीटों पर है।
पंजाब के धार्मिक डेरों के साथ ही ये सिख पंथक संस्थाएं भी इस चुनाव में बदलाव की वाहक होंगी। इसमें सर्वाधिक भूमिका सिखों के राष्ट्रवादी धड़े नामधारी सिखों की हो सकती है। पंजाब की सिख आबादी में ये दूसरा सबसे बड़ा समुदाय है। इनके गुरु राम सिंह कूका ने अपने शिष्यों के साथ स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों से लोहा लिया था। वहीं कूका वीरों ने गोरक्षा के लिए आत्माहुति दी है। वर्तमान में इस परंपरा के वाहक नामधारियों के सर्वोच्च गुरु ठाकुर उदय सिंह हैं।
पंजाब में सबसे अधिक हिंदू वोटरों की संख्या है। सूबे में हिंदू वोटर 38.49 वोट प्रतिशत के साथ सबसे अधिक हैं। इसके बाद 31.94 प्रतिशत के साथ अनुसूचित जाति वर्ग के वोटर दूसरे नंबर पर और जट सिख 19 वोट प्रतिशत के साथ तीसरे नंबर पर हैं। 10.57 प्रतिशत अन्य वर्ग हैं।