पंजाब के पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) जसकीरत सिंह चहल की सुरक्षा हटाने को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि करदाताओं के पैसे पर वीआईपी ट्रीटमेंट की प्रथा को बंद करना अनिवार्य हो गया है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने उनकी सुरक्षा वापस लेने के पंजाब सरकार के फैसले पर मुहर लगा दी।
जसकीरत सिंह चहल ने याचिका दाखिल करते हुए हाईकोर्ट को बताया कि उनकी सेवाओं के लिए उन्हें पुलिस मेडल प्राप्त हुआ था। पंजाब में आतंकवाद के दौर में उन्होंने उल्लेखनीय भूमिका अदा की थी। इस दौरान उनके घर को भी आग लगा दी गई थी। इसके बाद से ही उन्हें एक निजी सुरक्षा अधिकारी मिला था।
चार अप्रैल 2017 को पंजाब सरकार ने उनकी सुरक्षा को वापस ले लिया। याची ने अपील की है कि उसे दोबारा निजी सुरक्षा अधिकारी मुहैया करवाया जाए। इसके जवाब में पंजाब सरकार ने बताया कि इंटेलिजेंस की रिपोर्ट को आधार बनाते हुए तथा सुरक्षा की समीक्षा के बाद पाया गया कि याची को कोई खतरा नहीं है। इन रिपोर्ट को आधार बनाकर ही याची की सुरक्षा को वापस लेने का निर्णय लिया गया है।
हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद फैसला सुनाया कि याची के साथ हाल फिलहाल ऐसी कोई घटना नहीं हुई है, जिससे उसकी सुरक्षा को खतरा महसूस हो। इसके साथ ही सुरक्षा की यह मांग किसी खतरे को लेकर नहीं बल्कि वीआईपी के रूप में खुद को प्रदर्शित करने से संबंधित ज्यादा लगती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि सीमित सार्वजनिक संसाधनों को प्रतिष्ठा प्रदर्शन के लिए लगाने का आदेश नहीं दिया जा सकता। करदाताओं के पैसे का उपयोग करके राज्य के खर्च पर किसी को वीआईपी ट्रीटमेंट देने की प्रथा को बंद करना होगा। इन टिप्पणियों के साथ ही हाईकोर्ट ने जसकीरत सिंह चहल की सुरक्षा से जुड़ी याचिका को खारिज कर दिया।