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स्वर्ण पदक विजेता नीरज के गांव का हाल: स्टेडियम में घुटनों तक घास और दलदल, सुविधाओं के अभाव में दम तोड़तीं प्रतिभाएं

Tue, 10 Aug 2021 04:22 PM IST
ajay kumar संवाद न्यूज एजेंसी, पानीपत (हरियाणा)

सार

हरियाणा के पानीपत के खंडरा गांव निवासी नीरज चोपड़ा ने टोक्यो ओलंपिक और एथलेटिक में देश का पहला स्वर्ण पदक जीता। नीरज की इस जीत पर पूरे देश ने खुशी मनाई। उनका गांव भी इस उत्सव में शामिल था। लेकिन नीरज के गांव में खेल प्रतिभाएं दम तोड़ रही हैं। इसकी वजह सुविधाओं का अभाव है। 
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नीरज चोपड़ा। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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टोक्यो ओलंपिक में सोना जीतने वाले नीरज चोपड़ा के गांव के युवाओं में भी जोश है कि वह भी अपने देश के लिए सोना जीतकर लाएं लेकिन गांव में स्टेडियम न होने की समस्या खंडरा के युवाओं का सपना तोड़ रहीं हैं। गांव में स्टेडियम न होने की वजह से केवल 25 खिलाड़ी ही बचे हैं, जबकि पहले इनकी संख्या 50 थी। 

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सुविधाओं के आभाव में इनका खेल प्रभावित हो रहा है। गांव के खिलाड़ियों ने बताया कि जब नीरज चोपड़ा के राष्ट्रमंडल खेलों में जैवलिन थ्रो में भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक जीता था तो सरकार ने स्टेडियम बनाने का एलान किया था। तीन साल बाद भी स्टेडियम नहीं बन सका।

                                                            अमन और दीपक।
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उन्होंने बताया कि अगर कोई बच्चा खेल की शुरुआत करना चाहता है तो वह भी एक दो दिन स्कूल में अभ्यास करके ही अपने घर चला जाता है। पूरे गांव के खिलाड़ी 500 मीटर दूर एक निजी स्कूल में तैयारी करते हैं, जहां जैवलिन थ्रो के कोच हैं। स्कूल में उपकरण और अलग-अलग मैदान न होने के कारण धीरे धीरे रुचि कम हो रही है और बच्चे अपने घर पर ही अन्य काम में लग जाते है। इस स्कूल में नीरज चोपड़ा का दोस्त हरेंद्र उर्फ मोंटू ही गांव के खिलाड़ियों को भाला फेंकना सिखा रहा हैं।
                   स्टेडियम में घुटने तक घास व कीचड़, स्टेडियम को जाने वाला कच्चा रास्ता।

2021 में भी गांव खंडरा में 2011 वाले ही हालात
2021 में भी गांव खंडरा के 2011 वाले ही हालात है। जहां 10 साल बाद भी गांव में अभी तक स्टेडियम नहीं है। जब नीरज चोपड़ा ने 2011 में फेंकने की शुरुआत की थी तब भी गांव में स्टेडियम नहीं था। जिसकी वजह से लोगों से लिफ्ट लेकर असंध रोड तक आना पड़ता था, जिसके बाद वह पैदल ही स्टेडियम तक जाते थे। उस गांव में आज भी यदि किसी बच्चे को खेल का अभ्यास करना है तो पानीपत के शिवा स्टेडियम आना पड़ता है।

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स्टेडियम में नहीं रखी गई है अभी तक नींव, घुटनों तक घास और दलदल

पवन और रिंकू। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
स्टेडियम के लिए दी गई जमीन पर स्टेडियम का नाम निशान भी नहीं है। स्टेडियम की पांच किले की जमीन पर घुटनों तक घास हैं और बरसात होने के कारण दलदल है। सरकार के एलान के बाद और जमीन तय करने के बाद गांव के खिलाड़ियों ने खुद ही ईंट लगाकर स्टेडियम में अलग-अलग ग्राउंट बनाए थे लेकिन जमीन पर विवाद होने के कारण अब खिलाड़ियों ने यहां खेलना छोड़ दिया है।खिलाड़ियों का कहना है कि पहले इस स्टेडियम में 50 से ज्यादा खिलाड़ी रोज खेलने आते थे।


तीन साल पहले मैं खुद क्रिकेट खेलता था पर स्टेडियम न होने के कारण छोड़ दिया है। सिर्फ मैंने ही नहीं गांव के कई खिलाड़ी ने स्टेडियम की जमीन पर विवाद होने के बाद खेलना छोड़ दिया है। - रिंकू, खिलाड़ी
 
स्टेडियम केवल नाम नाम का है। स्टेडियम में घुटनों तक की घास हैं न तो स्टेडियम समतल है न ही सूखी जमीन। दलदल बना है। कोई खिलाड़ी खेलना चाहे तो भी नहीं खेल सकता है। - पवन, खिलाड़ी
 
सरपंच द्वारा दी गई जमीन पंचायत की नहीं बल्कि शामलात की है, जिसे सरपंच ने स्टेडियम के लिए दे दिया था लेकिन अब इस स्टेडियम पर स्टे ऑर्डर है। - दिपक, खिलाड़ी
गांव से 200 मीटर दूर ही पंचायत की आठ किले जमीन खाली है। सरकार को उस पर स्टेडियम बनाना चाहिए। यदि स्टेडियम नहीं बनाया गया तो गांव में यह 25 खिलाड़ी भी धीरे- धीरे खेलना बंद कर देंगे। - अमन,खिलाड़ी
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