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पीजीआई में घोटालों की परतें खोलीं, मरीजों के मसीहा बने

Mon, 28 Dec 2015 04:53 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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सुभाष चंद्र ने भ्रष्टाचार की लड़ाई लड़ने के साथ-साथ मानवता की सेवा में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। बहुत कम लोग ऐसे मिलते हैं। पीजीआई का ये रिटायर्ड कर्मचारी पिछले तीन दशक से भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे हैं। पीजीआई में उन्होंने भर्ती, टेंडर, पार्किंग और उपकरण की खरीद-फरोख्त संबंधी कई घोटालों की परतें खोलीं।
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उसके बाद पीजीआई को एक्शन भी लेना पड़ा। इसी तरह से जरूरतमंदों की सेवा के लिए उन्होंने एक निर्गुण प्रेमा भक्ति मिशन संस्था बना रखी है, जो ब्लड डोनेशन, आंखों के आपरेशन और जरूरतमंद मरीजों की आर्थिक मदद करने में अहम भूमिका निभाती है।

कर्मचारियों के इंसाफ के लिए 60 दिन रहे जेल में
सुभाष चंद्र की नियुक्ति पीजीआई में बतौर क्लर्क हुई थी। आंदोलन की शुरुआत 1980 में हुई। उस दौरान सिक्योरिटी अफसर ने सफाई कर्मचारी को थप्पड़ मार दिया। सिक्योरिटी अफसर पर कार्रवाई के लिए पूरे कर्मचारी सुभाष चंद्र के नेतृत्व में एकजुट हो गए। करीब 15 दिन तक आंदोलन चला।
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1994 में नर्सों से छेड़खानी के मामले में 33 दिन तक आंदोलन चला। कुछ सिक्योरिटी अफसरों ने नर्सों के साथ अभद्र व्यवहार किया था। उस दौरान सभी यूनियन एकजुट हो गईं। अपनी मांगों और नर्सों के पक्ष में काफी जोरदार आंदोलन चला।

हाईकोर्ट को लेना पड़ा था संज्ञान
33 दिन तक चले आंदोलन ने हड़ताल का रूप ले लिया। पीजीआई में त्राहि-त्राहि मच गई। ऐसा दावा किया गया कि उस दौरान कई मरीजों की जान तक चली गई थी। आखिर में हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया। बातचीत कर हल निकालने के निर्देश दिए।

1996 में हाईकोर्ट ने सुभाष चंद्र के पीजीआई आने पर रोक लगा दी, लेकिन वे और कर्मचारी नेता अश्विनी कुमार मुंजाल बिना किसी आदेश की परवाह किए पीजीआई पहुंच गए। पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर जेल भिजवा दिया। जब तक पीजीआई में रहे, तब तक कर्मचारियों के लिए लड़ते रहे। वे 2009 में रिटायर हो गए थे, लेकिन पीजीआई कर्मचारियों की समस्याएं सुनने के लिए वे रोजाना पीजीआई पहुंचते हैं।

मुफ्त आपरेशन और साल में अपनी एक पेंशन देते हैं मरीजों को
सुभाष चंद्र निर्गुण प्रेमा भक्ति मिशन भी चलाते हैं। इसके माध्यम से वे जरूरतमंद मरीजों की आंखों के आपरेशन, ब्लड डोनेशन कैंप, मेडिकल और होम्योपैथिक कैंप लगाने के लिए आर्थिक मदद करते हैं। इसके अलावा हर साल अपनी एक पेंशन मरीजों को देते हैं। इसके अलावा जब भी कोई मरीज को रुपये की जरूरत पड़ती है तो उसे नगद रुपये भी देते हैं। पिछले दिनों एक बच्चे के इलाज के लिए उन्होंने 50 हजार रुपये की मदद की थी।
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