फौज से छुट्टी लेने के बाद यदि कोई सैनिक एक्सीडेंट में घायल हो जाए या फिर किसी हादसे में उसे चोट लग जाए तो वह विकलांगता पेंशन का हकदार होगा। उसे सभी बैनीफिट दिए जाएंगे, जो विकलांगता पेंशन के अंतर्गत आते हैं।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने यह आदेश चंडीगढ़ आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल (एएफटी) के फैसले के खिलाफ दायर की गई एक याचिका पर सुनाया है। एएफटी ने याचिकाकर्ता को विकलांगता पेंशन देने से मना कर दिया था।
उनका कहना था कि छुट्टी पर गया सैनिक ऑन ड्यूटी पर नहीं रहता है। इसलिए विकलांगता पेंशन नहीं दी जा सकती। जिन सैनिकों की 15 साल से सर्विस कम होती है और वह घटना के शिकार होते हैं तो उन्हें किसी भी प्रकार की पेंशन नहीं दी जाती।
हाईकोर्ट की बेंच जस्टिस हेमंत गुप्ता व जस्टिस फतेह दीप सिंह ने एएफटी के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि छुट्टी लेना एक सैनिक का मानवीय अधिकार है। कोई भी सैनिक बिना छुट्टी लिए 365 दिन तक ड्यूटी नहीं कर सकता।
सैनिक छुट्टी इसलिए लेता है कि वह घर जाकर अपने रुके काम पूरे कर सके, क्योंकि जब वह देश की सुरक्षा के लिए सरहद पर तैनात रहता है तो उसके गैरहाजिर पर कई काम पूरे नहीं हो पाते। सैनिक को छुट्टी इसलिए भी देनी चाहिए, ताकि सिविल सोसाइटी के संपर्क में रह सके और उसका मनोविज्ञान भी स्थिर रह सके।
इस पर आर्मी की तरफ से कहा गया कि जब सैनिक छुट्टी लेता है तो उनकी निगरानी पर नहीं रहता। यदि उनके अनुशासन में रहे तो वह उसकी जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं। इस तर्क पर हाईकोर्ट ने कहा कि यदि ऐसी बात है तो जब सैनिक छुट्टी ले तो उसकी जिम्मेदारी भी ले लीजिए।
इस तर्क के बाद हाईकोर्ट ने घायल सैनिक को विकलांगता पेंशन देने के आदेश जारी कर दिए। चंडीमंदिर में रहने वाला याचिकाकर्ता बरकत मसीह सेना से आफिशियल छुट्टी लेकर घर आया था। जब वह स्कूटर से चंडीमंदिर स्थित कैन्टोनमेंट एरिया में जा रहा था, तभी आर्मी के ट्रक ने उसे टक्कर मार दी।
इससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया और उसे गंभीर चोटें आईं। उसे सेना ने कोई भी पेंशन देने से मना कर दिया। बाद में उसने एएफटी में दस्तक दी, लेकिन कोई भी राहत नहीं मिली। उसके बाद हाईकोर्ट में दस्तक दी।