राजनीति के तीन सूत्र पहला जो अपना कहे उसी पर ज्यादा शक करो, दूसरा किसी रिश्ते को न मानकर भावुक न हों और तीसरा जो आसान लगे वही मुश्किल है।
यह तीन सूत्र सिखाते सिखाते गुरु अपने शिष्य को ऐसी गंदी राजनीति सीखाता है, जिसका शिकार एक दिन उन्हें खुद होना पड़ता है। शगुफे -2014 थिएटर फेस्टिवल के तहत दूसरे और अंतिम दिन नाटक ‘लल्लू राजकुमार ते तिन रंगी परी’ खेला गया। पाली भूपिंदर के लिखे नाटक का निर्देशन किया बरिंदरजीत बन्नी ने।
नाटक की शुरूआत नुक्कड़ नुमा सेट से होती है, जिसमें एक नट और नटी नाटक की शुरूआत करते हैं। थ्री इडियट्स नुमा तीन मस्खरे कहानी आगे बढ़ाते हैं। नाटक की शुरूआत में एक औपचारिक घोषणा होती हैं।
इसमें एक राजा अपने बेटे को राजनीति सिखाने के लिए एक शिक्षक नियुक्त करने की बात करते हैं। साथ ही उसे अपना आधा राज्य देने की भी बात करते हैं। इसी बीच एक बूढ़ा चरवाहा वहां आता है और राजा की बात मानते हुए राजा के बेटे लल्लू को राजनीति सिखाने की बात कहता है।
चरवाहा सबसे पहले लल्लू को एक कहानी सुनाता है। इसमें जनता देवी की बेटी आजादी एक राक्षस के पास कैद है। उसे छुड़ाने के बाद ही लल्लू एक कामयाब राज संभाले वाला बनेगा।
गुरु का दांव अंत में गुरु पर ही भारी पड़ जाता है, जब लल्लू आखिर में सबक सीख जाता है कि राजनीति क्या होती है। लल्लू गुरु को अपना आधा राज्य देने की जगह राजनीति का ज्ञान किसी और को न देने की सूरत में उसकी जबान काट देता है।
नाटक उस वक्त और दमदार लगता है, जब बीच-बीच में होने वाले अंग्रेजी संवाद नाटक की पेस को बढ़ाते हैं। अदाकारी में बॉडी लैंग्वेज का काफी शानदार तालमेल देखने को मिला।
दर्शकों की राय
नाटक देख कर अच्छा लगा। ऐसे नाटक देखकर पता चलता है कि राजनीति कितनी मुश्किल है। खासकर लल्लू का रोल और उस कलाकार का काम बहुत पसंद आया।
-सुखप्रीत सिंह
नाटक के डायलॉग बहुत दमदार थे। बीच-बीच में अंग्रेजी के संवाद एक नए रूप में पेश किए गए, जो सराहनीय हैं।
- रशमिंदर सिंह