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किसानों की नजर आसमान पर, कैसा रहेगा मॉनसून, 5 बड़े कारण

Mon, 27 Jun 2016 01:17 PM IST
अखिल तलवार/अमर उजाला, चंडीगढ़
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पंजाब में खेती और उत्पादन पर मॉनसून का असर - फोटो : फाइल फोटो
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पंजाब के किसानों की निगाहें अब मौसम पर टिक गई हैं। वहीं प्यासी धरती और गिरते भूजल स्तर को भी अच्छे मानसून से उम्मीदें हैं। क्योंकि मौसम विभाग ने इस साल बढ़िया मानसून की संभावना जताई है। धान के सीजन के दौरान पंजाब के किसान पिछले दो सालों से सूखे का सामना कर रहे हैं। दोनों साल मानसून बेहद खराब रहा, लेकिन पंजाब का करीब 98 प्रतिशत खेतीबाड़ी एरिया सिंचित होने केकारण यहां सूखा नहीं घोषित किया गया।
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पंजाब के किसानों ने अपने खून-पसीने की कमाई से जमीन को सींचा। नतीजतन प्रतिकूल मौसम केबावजूद धान की बंपर फसल हुई। पिछले साल ही धान का रिकार्ड उत्पादन 137.9 लाख टन हुआ। पंजाब में 65 प्रतिशत मार्जिनल और छोटे किसान हैं। बड़ी संख्या में लोग ठेके पर जमीन लेकर खेती करते हैं, जिन्हें प्रतिकूल मौसम का खामियाजा भुगतना पड़ता है। खेतीबाड़ी विभाग का मानना है कि खराब मानसून के चलते पिछले दोनों सालों में किसानों की उत्पादन लागत करीब 25 फीसदी तक बढ़ गई।

क्योंकि बारिश न होने से इनपुट कॉस्ट बढ़ गई। किसानों को डीजल से ट्यूबवेल चलाना पड़ा, मेंटेनेंस का खर्च भी बढ़ गया, जिसके चलते लाभ काफी कम हो गया। इसी को देखते हुए इस साल खेतीबाड़ी विभाग ने धान का एमएसपी 2011 रुपये प्रति क्विंटल किए जाने का प्रस्ताव भेजा था, लेकिन केंद्र सरकार ने पिछले साल की तुलना में सिर्फ साठ रुपये बढ़ोतरी करते हुए एमएसपी 1510 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया।
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मौसम विभाग का अनुमान है कि मानसून 27-30 जून के बीच पंजाब पहुंचेगा। विभाग ने इस साल सामान्य से पांच प्रतिशत ज्यादा बारिश की भी उम्मीद जताई है, जिस पर किसानों की उम्मीदें टिकीं है। इसीलिए अब तक पंजाब में धान की बिजाई ने रफ्तार नहीं पकड़ी है। अगर जोरदार बारिश होती है कि किसानों की इनपुट कॉस्ट काफी कम हो जाएगी, जिससे मुनाफा बढ़ेगा।

मजदूरों की किल्लत, नहरी पानी की समस्या

पंजाब में खेती और उत्पादन पर मॉनसून का असर - फोटो : फाइल फोटो
पंजाब सरकार के तमाम दावों के बावजूद धान सीजन में नहरी पानी की समस्या आ रही है। वहीं, किसानों को बिजाई केलिए मजदूर नहीं मिल रहे हैं। जिसकेचलते धान की बिजाई ने अब तक रफ्तार नहीं पकड़ी है। पंजाब में धान की बिजाई 15 जून को शुरू हुई थी, लेकिन अब तक सिर्फ 25 फीसदी बिजाई ही हुई है।

सबसे ज्यादा समस्या मजदूरों की आ रही है। किसानों को मजदूर नहीं मिल रहे हैं। जो मजदूर मिल रहे हैं, उनके रेट बहुत ज्यादा हैं। दोआबा के सभी जिलों में किसानों को नहरी पानी की समस्या से जूझना पड़ रहा है। यहां बिस्त दोआब नहर से पानी सप्लाई किया जाता है। इस नहर की रिपेयर के चलते किसानों को नहरी पानी नहीं मिल रहा है। सिंचाई विभाग का दावा है कि तीस जून तक रिपेयर का काम पूरा कर लिया जाएगा।

उधर, माहिरों का कहना है कि मई मध्य में बीजी गई पनीरी की रोपाई 30-35 दिन में हो जानी चाहिए वरना नुकसान हो सकता है। जून अंत में बिजाई तेज होने की संभावना है। सिंचाई मंत्री शरणजीत सिंह ढिल्लों ने कहा कि फरीदकोट, फिरोजपुर, फाजिल्का, मुक्तसर को सरहिंद नहर से पानी देने के प्रयास किए जा रहे हैं। अप्रैल में राजस्थान सरकार से नहर की सफाई की इजाजत मांगी गई थी, लेकिन उन्होंने नहीं दी। सफाई न होने से सप्लाई 20 प्रतिशत घटी है। सीनियर इंजीनियरों की एक टीम सरहिंद फीडर में तैनात की गई है, जो तकनीकी पक्ष से हरसंभव कदम उठाएगी।

धान को जरूरत है 35-40 सिंचाई की

पंजाब में खेती और उत्पादन पर मॉनसून का असर - फोटो : फाइल फोटो
खेतीबाड़ी विभाग के मुताबिक धान की फसल को हर समय पानी की जरूरत पड़ती है। एक सीजन के दौरान औसतन धान को 35 से 40 सिंचाई की जरूरत पड़ती है। अगर सूखे की स्थिति ज्यादा है तो 45 सिंचाई भी लग सकती हैं। हर समय खेत में चार इंच पानी रखना जरूरी है। अगर इस साल लगातार बारिश होती है तो किसानों को ट्यूबवेल से सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ेगी।

भूजल स्तर में होगा सुधार
पंजाब के लिए सबसे बड़ी समस्या गिरता भूजल स्तर है। राज्य के कई ब्लॉक को डार्क जोन घोषित किया जा चुका है। दो साल बाद बढ़िया मानसून से गिरते भूजल स्तर में भी सुधार होने की संभावना है। खेतीबाड़ी विभाग के डायरेक्टर जसबीर बैंस ने कहा कि बढ़िया मानसून को देखते हुए वाटर कंजर्वेशन और री-चार्जिंग के इंतजाम किए जा रहे हैं। चेक-डैम बना कर बारिश के पानी को रोका जाएगा, ताकि उसका बेहतर उपयोग किया जा सके। अगर मानसून अच्छा रहता है तो भूजल स्तर में सुधार होगा।

धान का रकबा बढ़ेगा, बासमती का घटेगा
गिरते भूजल स्तर को देखते हुए सरकार लगातार धान का रकबा घटाने की कोशिश कर रही है, लेकिन इस बार फिर धान का रकबा तीस लाख हेक्टेयर से ज्यादा होने की आशंका है। पिछले साल रकबा 29.75 लाख हेक्टेयर था, इस साल घटा कर 27.10 लाख हेक्टेयर करने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन सफेद मक्खी और अन्य कारणों से कपास उत्पादक किसानों ने धान की ओर रुख कर लिया। कपास का लक्ष्य पांच लाख हेक्टेयर था, बिजाई ढाई लाख हेक्टेयर ही हुई। वहीं, बासमती का रकबा पिछले साल 7.63 लाख हेक्टेयर था, लेकिन इसके रेट काफी गिर गए। जिसके चलते इस साल रकबा पांच लाख हेक्टेयर तक रहने की उम्मीद है।

धान की सीधी बिजाई से होगी पानी की बचत

पंजाब में खेती और उत्पादन पर मॉनसून का असर - फोटो : फाइल फोटो
पानी की कमी से जूझ रहे हरियाणा में धान की खेती के लिए नई डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे हर साल करोड़ों लीटर पानी की बचत के साथ-साथ खेती के लिए बिजली, श्रमिकों सहित अन्य मदों में होने वाला खर्च की कम होगा। हालांकि, अगर लंबे समय तक इस तकनीक को अपनाया जाए तो धान की पैदावार धीरे-धीरे सिमटने लगेगी।

धान की खेती पर अधिक पानी की जरूरत होने की वजह से केंद्र के सहयेाग से कृषि विभाग ने किसानों के लिए प्रोत्साहन योजना की शुरुआत की है। नई डीएसआर तकनीक अपनाने वाले किसानों को सरकार की ओर से प्रति एकड़ 3000 रुपये तक की अनुदान राशि देने का प्रावधान है। किसानों को इस तकनीक को अपनाने सहित ज्वार और बाजरा की फसलों को अधिक प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि न केवल फसल चक्र में बदलाव आए, बल्कि धान की फसल पर होने वाले पानी की बचत के साथ इसकी खेती पर होने वाले खर्च की भी बचत हो सके।

वर्ष 2015-16 में कुल 13.54 लाख हेक्टेयर में धान की बिजाई की गई, जिससे करीब 41.45 लाख टन धान की पैदावार हुई है। इसमें बासमती सहित अन्य किस्म के धान भी शामिल हैं। क्रॉप डायवर्सिफिकेशन के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने से जहां अन्य फसलों की पैदावार बढ़ेगी, वहीं पानी की कमी को दूर करने के लिए नई तकनीक से धान की पैदावार और गुणवत्ता भी प्रभावित होने की किसान आशंका जता रहे हैं।
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खेती के लिए कम हो रही है पानी की उपलब्धता

पंजाब में खेती और उत्पादन पर मॉनसून का असर - फोटो : फाइल फोटो
चंडीगढ़ में मुख्यत: यमुना कैनाल और भाखड़ा मेन लाइन से मिलने वाले पानी को सिंचाई विभाग की ओर से पूरे राज्यभर में आपूर्ति की जाती है। दोनों मुख्य स्त्रोतों के जरिये तकरीबन 14500 क्यूसिक पानी की उपलब्धता है, जिसका इस्तेमाल खेती, पेयजल, औद्योगिक इकाइयों के अलावा बिजली उत्पादन में भी किया जाता है। चूंकि धान की खेती के लिए गेहूं की तुलना में दोगुना से भी अधिक पानी की आवश्यकता होती है, ऐसे में सरकार की ओर से उस तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसमें पानी का खर्च कम हो।

सिंचाई विभाग के इंजीनियर इन चीफ एके गुप्ता के मुताबिक पानी की उपलब्धता में उतार चढ़ाव होता रहता है, लेकिन मानसून के दौरान यह मात्रा सामान्य से काफी बढ़ जाती है। उन्होंने बताया कि अलग मदों के लिए विभाग की ओर जलापूर्ति की जाती है। कृषि और सिंचाई विभाग केअधिकारियों के मुताबिक हिसार, फतेहाबाद, सिरसा सहित आसपास के कुछ जिलों में ही खेती के लिए भाखड़ा मेन लाइन से जलापूर्ति हो रही है।

इसके अलावा अन्य कार्यों में पानी का इस्तेमाल किया जाता है। पिछले दिनों के दौरान धान की खेती को कम प्रोत्साहित किया जा रहा है, क्योंकि पहले ही हरियाणा सूखे जैसी स्थिति से गर्मियों के दौरान जूझता रहा है। धान की खेती के लिए नई डीएसआर तकनीक को अपनाए जाने से धान की खेती के लिए कम पानी की जरूरत होगी तो दूसरी तरफ इस मद में होने वाले खर्च में भी कमी आएगी।

 
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