पंजाब सरकार ने ड्रग मामले में अकाली नेता बिक्रम सिंह मजीठिया के खिलाफ कार्रवाई शुरू करते ही इसके सियासी नफे-नुकसान का आंकलन भी शुरू हो गया है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि अगर मजीठिया गिरफ्तार हुए और आगामी विधानसभा चुनाव से पहले रिहा हो गए तो शिअद अपने नेताओं पर लगे नशा तस्करी को आरोपों को धो लेगी। लेकिन मजीठिया पर सरकार के वकील आरोप साबित करने में सफल हो गए तो कांग्रेस इसका लाभ चुनाव में अवश्य हासिल कर लेगी।
दूसरी ओर, मजीठिया की ओर से गुरुवार को अग्रिम जमानत के लिए वकीलों के जरिए अदालत का दरवाजा खटखटाया गया है। राज्य पुलिस मजीठिया को गिरफ्तार करने के लिए 7 टीमों का गठन कर उनकी तलाश कर रही है। अकाली दल के सूत्रों का कहना है कि राज्य सरकार किसी भी हालत में मजीठिया को गिरफ्तार करना चाहती है ताकि चुनावी माहौल में जनता को दिखा सके कि उसने ड्रग मामले में किया वादा पूरा कर दिया है। दरअसल, एनडीपीएस के नियमों के तहत पुलिस के पास चालान पेश करने के लिए तीन माह का समय रहता है। यानी तीन माह जांच के नाम पर आरोपी को कैद रखा जा सकता है। अगर मजीठिया पुलिस की गिरफ्त में आते हैं तो उन्हें मार्च में चुनाव से पहले रिहाई मिलना संभव नहीं होगा, भले ही उसके बाद चालान पेश होने पर वह रिहा हो जाएं।
विधि विशेषज्ञों का कहना है कि एसआईटी द्वारा तीन बार की जा चुकी जांच के बाद अब एफआईआर दर्ज करते समय भी मजीठिया के कब्जे से किसी नशीले पदार्थ की रिकवरी नहीं हुई है। उन पर भोला व बिट्टू औलख द्वारा लगाए गए आरोपों का भी कोई सबूत नहीं है क्योंकि मजीठिया के किसी वाहन या आवास से किसी तस्कर की गिरफ्तारी नहीं हुई है। इसके अलावा एसआईटी के प्रमुख हरप्रीत सिद्धू द्वारा ड्रग मामले में यह चौथी जांच की जा रही है, जिसके लिए हाईकोर्ट से अनुमति नहीं ली गई है। इसकी जांच रिपोर्ट को पुरानी सीलबंद रिपोर्टों में समाहित नहीं किया जा सकता। वहीं, भोला का केस 2019 में समाप्त हो चुका है और बिट्टू औलख भी रिहा हो चुका है।
उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने ड्रग मामले में मजीठिया पर कार्रवाई का खाका तो खींचा लेकिन तीन आला अधिकारियों ने इसे गैरकानूनी ठहराते हुए सहयोग देने से इनकार कर दिया। इस मामले में कानूनी तौर पर क्या कमियां हैं, उनका खुलासा मेडिकल लीव पर गए इनवेस्टीगेशन ब्यूरो के निदेशक एडीजीपी सतीश अस्थाना ने राज्य सरकार को भेजे पत्र में भी किया लेकिन सरकार ने अपना इरादा नहीं बदला और एसआईटी के प्रमुख और इनवेस्टीगेशन ब्यूरो में अस्थाना से जूनियर अफसर की मदद से एफआईआर तैयार कर ली, जिसमें नवनियुक्त एजी पटवालिया का राय भी शामिल की गई, ताकि सवालों से बचा जा सके। माना जा रहा है कि इसी कार्रवाई के लिए नवजोत सिद्धू के पसंदीदा अधिकारी संजीव चट्टोपाध्याय को नियमों के विरुद्ध जाकर कार्यकारी डीजीपी लगा दिया गया जबकि इस संबंध में पैनल यूपीएससी के पास लंबित है और सरकार उस पर अंतिम फैसले के लिए यूपीएससी की बैठक में भी नहीं गई।
शिअद इस पूरे प्रकरण में यह उम्मीद कर रहा है कि आगामी चुनाव से पहले इस केस का फैसला हो जाएगा, जिसमें राज्य सरकार की किरकिरी होना तय है। ऐसे में शिअद को मौका मिल जाएगा, जिसमें वह जनता के बीच सियासी बदलाखोरी के अलावा नशा तस्करी को लेकर पार्टी नेताओं पर लगते आरोपों को झूठा साबित कर सके।