लोकसभा चुनाव से पहले एससी वोट बैंक कांग्रेस के लिए बड़ी समस्या बन गया है। टिकट वितरण में जातीय संतुलन न बिठाने के कारण वाल्मीकि, मजहबी सिख समाज नाराज है। वहीं, रविदास बिरादरी के पुराने दिग्गज नेता भी टिकट न दिए जाने से खफा हैं और पार्टी को आंखें दिखा रहे हैं। पंजाब में एससी वोट बैंक का सबसे ज्यादा प्रभाव दोआबा में है।
2011 की जनगणना के मुताबिक, दोआबा की कुल आबादी 52.08 लाख में से करीब 37 फीसदी 19.48 लाख अनुसूचित जाति हैं। इनमें से रविदास बिरादरी के 11.88 और वाल्मीकि-मजहबी सिख समाज व अन्य एससी वर्गों के हैं। 2002 में दोआबा के एससी वोट बैंक ने कांग्रेस का साथ दिया तो पार्टी ने सरकार बनाई। लेकिन 2007 और 2012 में यह वोट बैंक कांग्रेस से टूट गया, तो पार्टी भी सत्ता से दूर हो गई। इन दोनों चुनाव में दोआबा में पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा।
2017 में फिर दोआबा के दलित वोट बैंक ने कांग्रेस पर भरोसा जताया तो वह सत्ता में आ गई। लेकिन अब लोकसभा चुनाव के टिकट वितरण में पार्टी जातीय संतुलन बिठाने में नाकाम रही। राष्ट्रीय संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने पहले आगाह भी किया था। फिर भी चार सुरक्षित सीटों में से एक पर भी वाल्मीकि-मजहबी सिख समाज को टिकट नहीं दिया गया।
जालंधर, सेंट्रल, शाहकोट, करतारपुर, नवांशहर, फरीदकोट, अमृतसर में यह समाज काफी प्रभावशाली है। फरीदकोट से टिकट मांग रहीं फिरोजपुर की विधायक सत्कार कौर ने यहां से एक मुस्लिम मोहम्मद सदीक को टिकट देना हैरानीजनक फैसला बताया। उन्होंने कहा कि यहां सबसे ज्यादा वोट मजहबी सिखों के हैं, फिर भी टिकट नहीं दिया गया।
उधर, रविदास बिरादरी की पुरानी लीडरशिप भी टिकट न दिए जाने से नाराज है। मोहिंदर सिंह केपी, संतोष चौधरी, शमशेर सिंह दूलो ने मोर्चा खोल रखा है। जालंधर की महिला कांग्रेस की पूर्व प्रधान और मौजूदा एआईसीसी कोआर्डिनेटर किट्टू गरेवाल ने चेतावनी दी है कि अगर बीस तक टिकट न बदले गए तो वह पार्टी से इस्तीफा देकर आंदोलन शुरू करेंगी।