फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जानिए, कैसे काम करती है स्टेल सेल थैरेपी

Sun, 31 Aug 2014 02:25 PM IST
आशीष वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
विज्ञापन
विज्ञापन
पैरों के निचले हिस्से में क्लॉटिंग व ब्लॉकेज की वजह से कई बार अल्सर और गैंगरीन के लक्षण दिखने लगते हैं। ऐसी स्थिति में मरीजों की टांग काटने की नौबत आ जाती है। पीजीआई के विशेषज्ञों की टीम ने नई तकनीक स्टेम सेल थैरेपी से ऐसे 80 मरीजों की टांग कटने से बचा ली।
विज्ञापन


यदि शुरुआती दौर में इसका पता लग जाए तो विशेषज्ञ इसका इलाज एंडो वस्कुलर ट्रीटमेंट (स्टेंट व बैलून डालकर) करते हैं। एक तिहाई मरीजों में यह तकनीक काम नहीं करती। आखिर में उनकी टांग काटने के सिवाए कोई चारा नहीं बचता।

70 प्रतिशत पाजिटिव परिणाम मिले

पीजीआई में आयोजित इमरजेंसी रेडियोलॉजी की कांफ्रेंस में पहुंचे एम्स के कार्डिक रेडियोलॉजी के एचओडी डा. संजीव शर्मा ने बताया कि तीन साल तक चली इस रिसर्च में हमें 70 प्रतिशत पाजिटिव परिणाम मिले हैं।

कुछ दिन हास्पिटल में रहने के बाद मरीज फिर से चलने के काबिल हो गए। किसी भी पेशंट में कोई काम्प्लीकेशन देखने को नहीं मिली। मरीजों को फालोअप के लिए भी बुलाया जा रहा है। ट्रीटमेंट पूरी तरह से सेफ है।

डा. शर्मा के मुताबिक  स्टडी में सिर्फउन पेशंट को शामिल किया गया था, जिनकी टांग कटनी थी। तीन साल तक चली स्टडी के परिणाम इसी साल के जुलाई में आए हैं। जल्द ही यह स्टडी एक इंटरनेशनल जरनल में पब्लिश हो जाएगी।

क्यों जमता है क्लॉट

क्लॉट जमने की प्रक्रिया को मेडिकल की भाषा में एक्यूट लिंब इस्केमिया कहते हैं। पैर में रक्त पहुंचाने वाली धमनी में थक्का जमने से निचले हिस्से में रक्तसंचार वाधित हो जाता है।

इसकी वजह खून की क्लॉटिंग, कोई हवा का बुलबुला, फोड़ा या एक्सीडेंट हो सकता है। ऐसा किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है।

लक्षण
पैर में दर्द रहता है। सिरहन महसूस होती है। पंजों पर या पैर के निचले हिस्से में काले, भूरे थक्के दिखने लगते हैं। समय पर इलाज शुरू न होने पर इनमें गलन और अलसर बनने लगते हैं। पैरालाइज जैसे लक्षण भी आते हैं।
विज्ञापन

ऐसे होता है इलाज

डा. शर्मा के मुताबिक पीड़ित मरीज के बोनमैरो से ब्लड सेल निकाल कर उसे लैब में भिजवाते हैं। वहां पर स्टेम सेल अलग कर इन्हें इंजेक्शन के माध्यम से मरीज में ब्लॉकेज के पास इंजेक्शन से इंजेक्ट किए जाते हैं।

इस सारी प्रक्रिया को एक ही दिन में अंजाम देना होता है। इसके बाद कुछ दिन मरीज को अस्पताल में निगरानी में रखा जाता और मरीज के चलने फिरने के काबिल हो जाता है।

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें