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फुलकारी: वो कला... जिसके बिना अधूरा है पंजाब का जिक्र, महिलाओं की आत्मनिर्भरता की भी गवाह

Tue, 25 Jul 2023 11:31 AM IST
निवेदिता वर्मा डिजिटल डेस्क, चंडीगढ़

सार

फुलकारी की उत्पति सातवीं सदी से मानी जाती है। पंजाब की फुलकारी पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इसकी जड़ें पाकिस्तान के मुल्तान से जुड़ी हैं। यह कढ़ाई मुख्यतया अविभाजित पंजाब और पंजाब से जुड़े हरियाणा के कुछ इलाकों में की जाती थी।
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पंजाब की फुलकारी। - फोटो : wikipedia
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विस्तार
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भारतीय संस्कृति में पंजाब का योगदान बहुत ज्यादा है। चाहे यहां का संगीत हो या खाना, सभी इसे काफी समृद्ध बनाते हैं। इसी परंपरा का हिस्सा है पंजाब की कढ़ाई जिसे फुलकारी कहा जाता है। फुलकारी वो कला है जिसके बिना पंजाब का जिक्र अधूरा है। पंजाब में लाजवंती कंचन, परांठा बूटी, चोप, सूरजमुखी जैसे फुलकारी के 52 डिजाइन कपड़ों पर उतारे जाते हैं। 

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कपड़े पर की जाती है फूलों की कलाकारी
फुलकारी दो शब्दों से मिलकर बनी है। फूल और कारी यानी फूलों की कलाकारी। फुलकारी में दुपट्टे या सादे सूती के कपड़े पर फूलों की कलाकारी की जाती है। पंजाब में महिलाएं दशकों से इस कला को जिंदा रखे हैं। 

पाकिस्तान के मुल्तान से जुड़ी हैं जड़ें
फुलकारी की उत्पति सातवीं सदी से मानी जाती है। पंजाब की फुलकारी पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इसकी जड़ें पाकिस्तान के मुल्तान से जुड़ी हैं। यह कढ़ाई मुख्यतया अविभाजित पंजाब और पंजाब से जुड़े हरियाणा के कुछ इलाकों में की जाती थी। फुलकारी में सिल्क धागों का प्रयोग किया जाता है और इसमें ज्यादातर लाल, पीले नारंगी रंगों का प्रयोग किया जाता है। पंजाब में शादी जैसे शुभ अवसर पर महिलाएं अपनी बेटियों को फुलकारी उपहार में देती हैं। 
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पटियाला की लाजवंती ने फुलकारी के बदौलत जीता पद्मश्री
पटियाला के त्रिपड़ी इलाके में रहने वाली लाजवंती (65) बताती हैं कि बंटवारे के बाद भारत आई मेरी नानी के साथ यह कला पाकिस्तान से आई थी। पांच साल की उम्र में नानी की देखादेखी मेरे भी हाथ में क्रोशिया आ गया। शौक कब जुनून बन गया मैं जान भी न सकी। डेढ़ साल में ही इतनी माहिर हो गई कि फुलकारी के तरह तरह के डिजाइन बनाने लगी। मेरे डिजाइन देख लोग दंग रह जाते। यकीन नहीं करते कि इतनी छोटी उम्र में कोई ऐसी कसीदाकारी कर सकता है। इसी कला की बदौलत मैंने न केवल पद्मश्री अवार्ड पाया बल्कि सैकड़ों महिलाओं को आत्मनिर्भर भी बनाया। 

कला ने किया जरूरतमंद महिलाओं का भला
लाजवंती बताती हैं कि फुलकारी की कला को हजारों महिलाओं को सिखाकर उन्हें आत्मनिर्भर बना चुकी हूं। वर्तमान में भी मेरे साथ पंजाब, हरियाणा, यूपी व राजस्थान तक की करीब 700 महिलाएं जुड़ी हैं। ज्यादातर जरूरतमंद थीं, जिनका गुजारा मुश्किल से होता था। आज इस कला की बदौलत वह अच्छी रोजी-रोटी तो कमा ही रही हैं, अन्य महिलाओं को भी सिखा रही हैं। लाजवंती ने बताया कि फुलकारी विदेशी महिलाएं भी खूब पसंद करती हैं। मैं अर्जेंटीना, कोलंबिया, चिली, जर्मनी में अपने कपड़ों की प्रदर्शनी लगा चुकी हूं। वहां इसे काफी पसंद किया गया। फुलकारी वाले कपड़ों की आज भी अच्छी खासी मांग है। 
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फुलकारी को नए कलेवर में लाने की कोशिश
लाजवंती बताती हैं कि लड़कियां सूट व साड़ी पहनना ज्यादा पसंद नहीं करती हैं। उन्हें स्टाल, क्रॉप टॉप व शार्ट कुर्ती ज्यादा पसंद है। इसलिए उनके हिसाब से इन कपड़ों पर फुलकारी के नए नए डिजाइन बना रही हूं। पहले केवल रेशम के धागों से फुलकारी की कढ़ाई होती थी, लेकिन अब इसमें स्टोन, मोती, जरकन और गोटा वगैरह का इस्तेमाल भी होने लगा है।

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