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दिल पर हाथ रखकर दीपक बोले- आपका शुक्रिया... मुझे नया जीवन दिया

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डॉक्टरों की टीम के साथ उपस्थित ट्रांसप्लांट करवाने वाले दीपक। - फोटो : CHANDIGARH
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चंडीगढ़। पीजीआई में हृदय प्रत्यारोपण से पंजाब के बठिंडा निवासी दीपक को नई जिंदगी मिली है। बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े दीपक को करनाल के एक अंगदाता का हृदय प्रत्यारोपित किया गया। सर्जरी के एक महीने के बाद बुधवार को उन्हें छुट्टी दी गई। इस मौके पर 28 साल के दीपक ने अपने दिल पर हाथ रखकर कहा कि मैं आपका शुक्रगुजार हूं जिसकी वजह से मुझे नया जीवन मिला। इस दौरान दीपक ने अपनी कहानी बयां की। वहीं उनमें हृदय प्रत्यारोपित करने वाले पीजीआई के डॉक्टरों की टीम ने भी सर्जरी से जुड़ी जानकारी दी।
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पीजीआई के एडवांस कार्डियक सेंटर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान कार्डियक थोरेसिक एंड वसक्युलर सर्जरी के प्रो. श्याम ने बताया कि दीपक को एक साल पहले परेशानी शुरू हुई थी। उस दौरान उसे सांस फूलने और थकान की शिकायत थी। वह कोरोना संक्रमित भी हो गया था। जांच में उसके हृदय की कोशिकाओं में गड़बड़ी पाई गई, लेकिन कोविड होने के कारण उसे लगातार नौ महीने तक फॉलोअप में रखा गया ताकि इस बात को पुष्टि की जा सके कि यह समस्या कोविड के कारण नहीं बल्कि हार्ट में हुई गड़बड़ी के कारण हो रही है। उस दौरान उसे ड्रग थैरेपी पर रखा गया। मार्च में उसमें हृदय प्रत्यारोपित किया गया। अब वह पूरी तरह ठीक है।
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नौ साल में सात हृदय प्रत्यारोपण
इस अवसर पर एनेस्थिसिया विभाग के प्रमुख व पीजीआई के डीन एकेडमिक प्रो. जीडी पुरी ने बताया कि संस्थान में 2014 में हृदय प्रत्यारोपण की शुरुआत की गई थी। अब तक 7 मरीजों में सफल प्रत्यारोपण किया जा चुका है। वहीं कोविड के दौरान भी यह क्रम नहीं थमा। दो मरीजों में हृदय प्रत्यारोपित किया गया है। इनमें 2020 में 13 साल का एक लड़का व 2022 में 32 साल का एक पुरुष शामिल है। प्रो. पुरी ने बताया कि हृदय प्रत्यारोपण के बाद पहला साल बेहद महत्वपूर्ण होता है। उस दौरान दवा, फॉलोअप, जांच में किसी तरह की लापरवाही नहीं होनी चाहिए। इस अवसर पर हृदय प्रत्यारोपण करने वाली टीम में शामिल प्रो. अजय बहल, प्रो. सौरभ मल्होत्रा, प्रो. भूपेश कुमार, प्रो. बनश्री मंडल भी वहां मौजूद थीं।
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प्रो. पुरी बोले- समय पर हृदय प्रत्यारोपित करने से 70 प्रतिशत की बच सकती है जान
प्रो. पुरी ने बताया कि हृदय संबंधी परेशानी होने पर जिन मरीजों को प्रत्यारोपण की जरूरत होती है अगर उन्हें समय पर हृदय प्रत्यारोपित कर दिया जाए तो उनमें से 70 प्रतिशत की जान बचाई जा सकती है। इसके विपरीत ड्रग थैरेपी में यह दर महज 10 प्रतिशत है इसलिए समय रहते जांच और हृदय प्रत्यारोपण का प्रयास किया जाना चाहिए। इसके लिए आयुष्मान भारत समेत कई सरकारी योजनाएं भी जरूरतमंद मरीजों की मददगार साबित हो सकती हैं।
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मोहित भी सात साल से जी रहे सामान्य जीवन, अब पीजीआई में करते हैं नौकरी
पीजीआई में सात साल पहले हृदय प्रत्यारोपित कराने वाले 18 साल के मोहित भी इस दौरान वहां उपस्थित थे। उन्होंने बताया, ‘सात साल पहले अचानक तबीयत बिगड़ी तो जांच कराने पर पता चला दिल में खराबी है। कुछ महीनों तक इलाज चला फिर डॉक्टरों ने हृदय प्रत्यारोपण के लिए कह दिया। उस वक्त हृदय प्रत्यारोपण के लिए परिवार के पास पैसे भी उपलब्ध नहीं थे। पीजीआई के डॉक्टरों ने हमारी हरसंभव मदद की। सौभाग्य से अंगदान से एक हृदय मिला और मुझसे क्रॉस मैच हो गया। हृदय प्रत्यारोपण के सात साल गुजरने के बाद भी मैं पूरी तरह ठीक हूं। पीजीआई ने मेरी जान बचाई। अब पीजीआई में ही नौकरी कर अपना और अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहा हूं।’
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