पीजीआई के करीब आठ हजार नॉन फैकल्टी सदस्यों को राहत मिलने के आसार बन गए हैं। प्रमोशन सहित 28 मांगे मंजूर करने के कैट के फैसले के खिलाफ पीजीआई ने सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पटीशन (एसएलपी) दायर की थी।
11 जुलाई को सुनवाई के दौरान जब मेरिट पर बहस चल रही थी तो सुप्रीम कोर्ट ने पीजीआई के काउंसिल से पूछा कि हाईकोर्ट ने आपको समय दिया था तो वहां पर रिव्यू पटीशन क्यों नहीं दायर की। कैट के फैसले को गलत ठहराए जाने को कोई ठोस कारण भी नहीं बता पा रहे।
पीजीआई के काउंसिल को लगा कि उनकी याचिका खारिज हो सकती है, इसलिए उन्होंने कहा कि वे हाईकोर्ट में रिव्यू पटीशन दायर करेंगे। उसके बाद संस्थान ने अपनी एसएलपी वापस ले ली। अब कयास लगाए जा रहे हैं कि पीजीआई जल्द ही हाईकोर्ट में रिव्यू पटीशन डाल सकती है।
पीजीआई के नॉन फैकल्टी मेंबरों ने अपने प्रमोशन के लिए कैट में याचिका दायर की थी। 10 जुलाई 2013 को उनकी 29 में से 28 मांगे मंजूर कर पीजीआई को सभी को जल्द लागू करने के निर्देश जारी कर दिए गए। इस फैसले के खिलाफ पीजीआई 31 मार्च 2014 को हाईकोर्ट में चली गई।
हाईकोर्ट ने उसी दिन पीजीआई की याचिका को खारिज कर दी। उसके बाद सात मई 2014 को पीजीआई ने सुप्रीमकोर्ट में दस्तक दी थी। नॉन फैकल्टी मेंबरों को साल 1985 से प्रमोशन नहीं दिया गया है। एक ही पद पर कई कर्मचारी रिटायर तक हो चुके हैं।
धार कमेटी ने हर आठ साल में नॉन फैकल्टी मेंबरों को प्रमोशन दिए जाने की सिफारिश की थी, लेकिन पीजीआई ने उसे मानने से मना कर दिया था। रिसर्च स्टाफ साल 1968 से कांट्रैक्ट के पद पर काम कर रहा था। साल 1993 में उन्हें पक्का किया गया।
पीजीआई का कहना है कि जब से ये कर्मचारी पक्के हुए हैं, तब से उन्हें प्रमोशन के लिए योग्य माना जाए, जबकि रिसर्च स्टाफ चाहता है कि उसे 1968 से योग्य माना जाए। कैट ने इस मांग को भी मान लिया है। नॉन फैकल्टी मेंबर की एक्स इंडिया लीव 2008 में बंद कर दी गई थी। कैट ने उनकी लीव भी मंजूर कर दी थी।
मांग के लिए आठ बार हड़ताल हो चुकी है
1. 24 अक्तबूर 1991 से 20 दिसंबर 1991 तक
2. 21 फरवरी 1994 से 19 मार्च 1994 तक
3. 28 मार्च 1994 से आठ अप्रैल 1994 तक
4. 31 अगस्त 1994 से आठ सितंबर 1994 तक
5. एक दिसंबर 1995 से 11 दिसंबर 1995 तक
6. 13 अगस्त 1997 को 19 अगस्त 1997 तक
7. छह अप्रैल 1999 को एक दिन की भूख हड़ताल की
सांच को आंच नहीं। जो हमने पहले दिन कहा था, आज माननीय कोर्ट भी वही कह रहा है। हक की लड़ाई के लिए 20 साल से ज्यादा का वक्त हो चुका है। डाक्टरों के बराबर कर्मचारी काम कर रहे हैं तो उनके साथ अन्याय क्यों? हमें न्यायपालिका पर पूरा विश्वास है।
अश्विनी मुंजाल, चेयरमैन, पीजीआई इंम्प्लायज यूनियन