पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई एफआईआर आईपीसी के तहत दर्ज है और इसमें कोई नया आवेदन या याचिका 1 जुलाई के बाद दायर की जाती है, तो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के प्रावधान लागू होंगे।
हाईकोर्ट ने आईपीसी में दर्ज एफआईआर में सीआरपीसी के तहत एफआईआर रद्द करने की मांग को लेकर 4 जुलाई को दाखिल याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की है।
चंडीगढ़ निवासी अभिषेक जैन ने सेक्टर-17 में 4 नवंबर, 2023 को दर्ज एफआईआर रद्द करने की मांग को लेकर 4 जुलाई को सीआरपीसी की धारा 482 के तहत याचिका दाखिल की थी। जस्टिस सुमित गोयल ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि एक बार जब परिवर्तित प्रक्रियात्मक कानून बीएनएसएस प्रचलन में आ गया है, तो यह आईपीसी के तहत शुरू किए गए मामलों पर भी लागू होगा। हालांकि पहले से लंबित अपील, आवेदन आदि सीआरपीसी के तहत ही सुने जाएंगे।
जस्टिस गोयल ने कहा कि जुलाई 2024 में नए कानून अर्थात भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023; भारतीय न्याय संहिता, 2023 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 भारत में न्याय प्रशासन में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, जो कानूनों और न्याय के वितरण के लिए आधारभूत गतिशीलता का पुनरुद्धार है। नए कानून राज्य (समाज), पीड़ित और आरोपी के बीच संतुलन बनाते हुए मजबूत अभियोजन का मार्ग प्रशस्त करने में एक लंबा रास्ता तय करेंगे। न्यायालय ने कहा कि यह निवारण, न्याय और न्याय की प्रक्रिया को और अधिक मजबूती प्रदान करेगा।
बीएनएसएस की धारा 4 के अवलोकन से पुष्ट होता है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि बीएनएस के तहत सभी अपराधों की जांच/पूछताछ/परीक्षण किया जाएगा और बीएनएसएस के प्रावधानों के अनुसार ही निपटा जाएगा। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि याचिकाकर्ता को बीएनएसएस के प्रावधानों को लागू करने के लिए एक उचित याचिका दायर करने की स्वतंत्रता होगी, जैसा कि कानून में अनुमेय है।