हरियाणा में वर्चस्व की जंग ने चौटाला परिवार और इनेलो की प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी है। इस समय प्रदेश के सबसे मजबूत क्षेत्रीय दल का वजूद खतरे में है। अगले महीने होने वाला विधानसभा चुनाव इनेलो के लिए साख बचाने की लड़ाई बन चुका है। सबसे बड़ी चुनौती पार्टी और परिवार के विघटन के बाद इनेलो के प्रमुख नेता अभय चौटाला के सामने पुराना दमखम दिखाने की है। वर्तमान हालात में अभय को सबसे अधिक कमी अपने पिता पूर्व मुख्यमंत्री और इनेलो सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला की खल रही होगी।
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अगर ओपी चौटाला जेबीटी भर्ती मामले में सजा काटकर बाहर आ गए होते तो उन्हें फिर से पार्टी को खड़ा करने और बीते चुनावों का प्रदर्शन दोहराने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती। बड़े चौटाला का अब भी हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्रों में जहां काफी रसूख है, वहीं ताऊ देवीलाल की विरासत भी उनके पास है। बड़े भाई डॉ. अजय चौटाला और भतीजे दुष्यंत चौटाला के अलग राह पर चलते हुए नई पार्टी बनाने से सबसे अधिक नुकसान इनेलो को ही हुआ है।
जींद उपचुनाव में दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी के प्रत्याशी दिग्विजय चौटाला दूसरे स्थान पर रहे तो इनेलो प्रत्याशी मात्र चार हजार मतों के अंदर सिमट गए। लोकसभा चुनाव में भी पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। पार्टी प्रत्याशियों को बसपा-लोसुपा और कई जगह जजपा प्रत्याशियों से भी कम वोट मिले। इसके बाद इनेलो विधायकों में भगदड़ मच गई और एक-एक अधिकांश विधायक पार्टी छोड़ गए। अब अभय चौटाला के साथ वेद नारंग और ओमप्रकाश बरवा ही विधायक बचे हैं।
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बावजूद इसके अभय चौटाला और उनका पूरा परिवार पार्टी को फिर से खड़ा करने और मजबूती देने में लगा हुआ है। अभय जहां पार्टी कैडर को एकजुट कर रहे हैं तो पत्नी सुनैना चौटाला महिला विंग के बैनर तले महिलाओं और बेटा अर्जुन चौटाला आईएनएलडी स्टूडेंट आर्गेनाइजेशन के जरिए युवाओं को पार्टी केसाथ लाने में जुटे हैं। खापों ने परिवार और इनेलो-जजपा में सुलह का प्रयास जरूर किया, मगर सफल नहीं हो पाईं।
सत्ता की महत्वकांक्षा पड़ी भारी
जेबीटी भर्ती घोटाले में ओपी चौटाला और अजय चौटाला के जेल जाने के बाद अभय चौटाला ने ही हरियाणा में पार्टी की नींव मजबूत की और सबको एकजुट करके रखा। पार्टी केयुवा विंग की कमान भतीजे पूर्व सांसद दुष्यंत और छात्र विंग इनसो की कमान दिग्विजय चौटाला के हाथ रही। सत्ता पाने की महत्वकांक्षा को लेकर परिवार में अंदरखाने सब ठीक नहीं चल रहा था।
7 अक्टूबर 2018 को गोहाना के चौ. देवी लाल स्टेडियम में आयोजित सम्मान दिवस समारोह में तत्कालीन इनेलो सांसद दुष्यंत चौटाला के समर्थकों के अंदर धधकता लावा फूट पड़ा और उन्होंने अभय चौटाला के खिलाफ हूटिंग कर दी। इसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने अपने पोते दुष्यंत और दिग्विजय को अनुशासनहीनता के आरोप में पार्टी से निष्कासित कर दिया। बाद में अजय चौटाला भी पार्टी से बाहर कर दिए गए। दुष्यंत ने परदादा चौ. देवी लाल को मिली उपाधि जननायक का इस्तेमाल करते हुए जननायक जनता पार्टी का गठन कर दिया।
पार्टी टूटती देख विधायकों ने धारण किया भगवा
इनेलो में टूट का सबसे ज्यादा फायदा भाजपा को मिला। एक के बाद 11 विधायक भाजपा में शामिल हो गए। इनमें रणबीर गंगवा, जाकिर हुसैन, परमिंद्र ढुल, बलवान सिंह दौलतपुरिया, केहर सिंह, प्रो. रविंद्र बलियाला, नसीम अहमद, रामचंद कंबोज, नसीम अहमद, मक्खन लाल सिंगला, नगेंद्र भड़ाना शामिल हैं। चार विधायक नैना चौटाला, अनूप धानक, राजदीप फौगाट व पिरथी सिंह जजपा में चले गए। पिहोवा विधायक जसविंद्र सिंह संधू की मृत्यु हो गई। जींद से विधायक हरिचंद मिड्ढा की मृत्यु के बाद उनके पुत्र कृष्ण मिड्ढा भाजपा में शामिल हो गए और उपचुनाव में जींद सीट से जीत हासिल कर विधानसभा पहुंचे।
सात बार देवीलाल परिवार के पास रही सीएम की कुर्सी
हरियाणा की राजनीति में ताऊ देवीलाल परिवार की धमक रही है। इस परिवार ने सात बार प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। यह भी अपने आप में एक इतिहास है। दो बार देवीलाल तो पांच बार ओमप्रकाश चौटाला सीएम रहे।
देवी लाल 21-6-1977 से 10-5-1978 तक और 20-6-1987 से 2-12-1989 तक सीएम का पदभार संभाला। इसके बाद ओपी चौटाला ने 2-12-1989 से 23-5-1990, 12-7-1990 से 17-7-1990, 22-3-1991 से 6-4-1991, 24-7-1999 से 2-3-2000 और 2-5-2000 से 5-3-2000 तक सीएम रहे।
इनेलो से पहले लोकदल, जनता दल में रहा दबदबा
इनेलो के गठन से पहले देवीलाल परिवार लोकदल व जनता दल के बैनर तले राजनीति करता रहा। 1977 में आपातकाल के बाद हुए चुनाव में देवीलाल की अगुवाई वाले जनता दल ने हरियाणा में कांग्रेस को मात्र तीन सीटों पर समेट दिया था और खुद 75 सीटें जीती थी। इससे पहले लोकदल में देवीलाल परिवार ने अपनी धाक जमाकर रखी।
इनेलो का गठन तो 1987 में हो गया था, लेकिन विधानसभा का पहला चुनाव चश्मा चिन्ह पर पार्टी ने 2000 में भाजपा के साथ गठबंधन में लड़ा और पूर्ण बहुमत हासिल किया। इसके बाद पार्टी शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ती रही। एसवाईएल का पानी न मिलने पर दोनों दलों के बीच अब राजनीतिक रिश्ते खत्म हो चुके हैं।