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पंजाब में बदल रही तस्वीर: अब जलाने नहीं कमाने का साधन बनी पराली, लाखों रुपये कमा रहे ये किसान

Sun, 29 Oct 2023 05:25 PM IST
ajay kumar पीटीआई, चंडीगढ़

सार

मलेरकोटला के गुरप्रीत सिंह और एक अन्य किसान भी बेलर की मदद से पराली बेचकर कमाई कर रहे हैं। गुरप्रीत सिंह धान की पराली को गुज्जर समुदाय को बेचने के अलावा संगरूर में एक सीएनजी बायो गैस कंपनी और अमृतसर में एक अन्य कंपनी को आपूर्ति करते हैं। उन्होंने कहा कि पिछले साल मैंने 20 लाख रुपये की पराली बेची।
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किसान गुरप्रीत सिंह। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पराली की वजह से भले ही पंजाब बदनाम है मगर अब किसान इससे मुंह मोड़ रहे हैं। राज्य में बड़ी संख्या में किसानों ने इसे अब आय का साधन बनाना शुरू कर दिया है। देश में वायु प्रदूषण बढ़ने पर पंजाब के किसानों पर दोषारोपण किया जाता है। मगर अब बहुत से किसानों ने पराली को बायोमास संयंत्रों और बॉयलरों को लाखों रुपये में बेचना शुरू कर दिया है। कुछ साल पहले किसान जहां पराली को समस्या के तौर पर देख रहे थे तो वहीं अब इसे आय का जरिया मान रहे हैं। 

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गुरदासपुर जिले के सहरी गांव के किसान पलविंदर सिंह ने पराली को अपनी आय का साधन बनाया है। पलविंदर सिंह ने पिछले साल एक बेलर खरीदा था। इससे वे खेतों में पराली की गांठे बनाते हैं। 

बेलर एक कृषि मशीन है। इसे ट्रैक्टर से जोड़ा जाता है। यह खेत में पराली को इकट्ठा करती है और उसे गांठों में तब्दील कर देती है। पलविंदर सिंह का कहना है कि पिछले साल हमने 1,400 टन पराली की आपूर्ति की थी और इस साल हम 3,000 टन पराली की आपूर्ति की उम्मीद कर रहे हैं।

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पलविंदर सिंह अपने आस-पास के गांवों से पराली इकट्ठा करते हैं। इसके बाद इसे पठानकोट में एक बिजली उत्पादन कंपनी को बेचते हैं। उन्होंने कहा कि वह गुज्जर समुदाय को भी गांठें बेच रहे हैं। वे लोग इसे पशु चारे के रूप में इस्तेमाल करते हैं। पलविंदर सिंह ने कहा कि उन्होंने और उनके सहयोगियों ने एक साल के भीतर अपना सारा निवेश पहले ही वसूल कर लिया है। इस साल 15 लाख रुपये तक कमाई की उम्मीद है। वह 180 रुपये प्रति क्विंटल की दर से पराली बेचते हैं। 

उधर, मलेरकोटला के गुरप्रीत सिंह और एक अन्य किसान भी बेलर की मदद से पराली बेचकर कमाई कर रहे हैं। गुरप्रीत सिंह धान की पराली को गुज्जर समुदाय को बेचने के अलावा संगरूर में एक सीएनजी बायो गैस कंपनी और अमृतसर में एक अन्य कंपनी को आपूर्ति करते हैं। उन्होंने कहा कि पिछले साल मैंने 20 लाख रुपये की पराली बेची और सभी तरह के खर्चों को काटने के बाद 7-8 लाख रुपये की बचत की।
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गुरप्रीत सिंह ने पिछले साल 1,200 टन पराली बेची थी और इस साल उनकी योजना 5,000 टन पराली बेचने की है। वह पहले ही 1,800 टन पराली की बिक्री के लिए कंपनियों के साथ अनुबंध पर हस्ताक्षर कर चुके हैं। मालेरकोटला के गांव फिरोजपुर कुठाला गांव में 10 एकड़ कृषि भूमि के मालिक गुरप्रीत सिंह ने कहा कि इस साल हमने जनवरी और मार्च के बीच बेचने के लिए कुछ पराली का भंडारण करने की योजना बनाई है। उस समय इसकी कीमत 280-300 रुपये प्रति क्विंटल तक हो जाती है।

अभी पराली की कीमत 170 रुपये प्रति क्विंटल है। गुरप्रीत सिंह ने कहा कि उन्होंने पिछले साल 600 एकड़ भूमि पर फसल अवशेष जलाने से बचाया। इस साल हम 2,000 एकड़ से अधिक भूमि पर पराली जलाने से रोकेंगे। उन्होंने कहा कि वह गुजरात समेत अन्य राज्यों में भी पराली बेचने के विकल्प तलाश रहे हैं।

बायोमास संयंत्रों, पेपर मिलों और बॉयलरों में पराली की मांग बढ़ रही है। यही वजह है कि किसान अधिक बेलर खरीद रहे हैं। पंजाब सरकार पराली के एक्स-सीटू प्रबंधन के तहत बेलर की खरीद पर सब्सिडी देती है। राज्य सरकार ने पहले ही ईंट भट्टों को अपने कुल ईंधन जरूरत का 20 प्रतिशत भूसे के छर्रों का उपयोग करना अनिवार्य कर दिया है। 
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