पलविंदर सिंह अपने आस-पास के गांवों से पराली इकट्ठा करते हैं। इसके बाद इसे पठानकोट में एक बिजली उत्पादन कंपनी को बेचते हैं। उन्होंने कहा कि वह गुज्जर समुदाय को भी गांठें बेच रहे हैं। वे लोग इसे पशु चारे के रूप में इस्तेमाल करते हैं। पलविंदर सिंह ने कहा कि उन्होंने और उनके सहयोगियों ने एक साल के भीतर अपना सारा निवेश पहले ही वसूल कर लिया है। इस साल 15 लाख रुपये तक कमाई की उम्मीद है। वह 180 रुपये प्रति क्विंटल की दर से पराली बेचते हैं।
उधर, मलेरकोटला के गुरप्रीत सिंह और एक अन्य किसान भी बेलर की मदद से पराली बेचकर कमाई कर रहे हैं। गुरप्रीत सिंह धान की पराली को गुज्जर समुदाय को बेचने के अलावा संगरूर में एक सीएनजी बायो गैस कंपनी और अमृतसर में एक अन्य कंपनी को आपूर्ति करते हैं। उन्होंने कहा कि पिछले साल मैंने 20 लाख रुपये की पराली बेची और सभी तरह के खर्चों को काटने के बाद 7-8 लाख रुपये की बचत की।
गुरप्रीत सिंह ने पिछले साल 1,200 टन पराली बेची थी और इस साल उनकी योजना 5,000 टन पराली बेचने की है। वह पहले ही 1,800 टन पराली की बिक्री के लिए कंपनियों के साथ अनुबंध पर हस्ताक्षर कर चुके हैं। मालेरकोटला के गांव फिरोजपुर कुठाला गांव में 10 एकड़ कृषि भूमि के मालिक गुरप्रीत सिंह ने कहा कि इस साल हमने जनवरी और मार्च के बीच बेचने के लिए कुछ पराली का भंडारण करने की योजना बनाई है। उस समय इसकी कीमत 280-300 रुपये प्रति क्विंटल तक हो जाती है।
अभी पराली की कीमत 170 रुपये प्रति क्विंटल है। गुरप्रीत सिंह ने कहा कि उन्होंने पिछले साल 600 एकड़ भूमि पर फसल अवशेष जलाने से बचाया। इस साल हम 2,000 एकड़ से अधिक भूमि पर पराली जलाने से रोकेंगे। उन्होंने कहा कि वह गुजरात समेत अन्य राज्यों में भी पराली बेचने के विकल्प तलाश रहे हैं।
बायोमास संयंत्रों, पेपर मिलों और बॉयलरों में पराली की मांग बढ़ रही है। यही वजह है कि किसान अधिक बेलर खरीद रहे हैं। पंजाब सरकार पराली के एक्स-सीटू प्रबंधन के तहत बेलर की खरीद पर सब्सिडी देती है। राज्य सरकार ने पहले ही ईंट भट्टों को अपने कुल ईंधन जरूरत का 20 प्रतिशत भूसे के छर्रों का उपयोग करना अनिवार्य कर दिया है।