कोरोना का टीकाकरण सबके लिए बेहद जरूरी है। सरकार इसकी जरूरत को ध्यान में रखते हुए 12-14 और 15-18 साल के बच्चों के साथ अन्य उम्र के बच्चों को भी जोड़ने का प्रयास कर रही है लेकिन संक्रमण से बचाव के लिए चलाए जा रहे टीकाकरण अभियान की सफलता तब तक संदिग्ध है जब तक शत प्रतिशत आबादी का सहयोग न मिल जाए।
कोरोना टीकाकरण की बात तो महामारी के दौर के बाद की चीज है। मेरा मानना है कि अगर देश के नियमित टीकाकरण अभियान पर गौर किया जाए तो सारी स्थिति साफ हो जाएगी। टीकाकरण बच्चों के सेहतमंद जीवन की सबसे मजबूत नींव है। यह कहना है राज्य टीककरण अधिकारी मंजीत सिंह का। वे अभियान को सफल बनाने में अपनी पूरी टीम के साथ जुटे हुए हैं। डॉ. मंजीत के अनुसार कोरोना जैसे संक्रमण की गंभीरता से बचाने में कारगर साबित हो चुके टीके को लेकर अब भी लोगों के मन में भ्रम और डर का होना निराशाजनक है। इस टीके से जहां एक ओर संक्रमण से सुरक्षा मिलेगी, वहीं इसकी खुराक संक्रमित होने के बाद होने वाले आर्थिक, मानसिक व शारीरिक नुकसान से भी बचाएगी इसलिए इसे लगवाने में ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं है। इससे जुड़े सभी सोच-विचार, शोध और ट्रायल का कार्य सरकार ने सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। हमारी जिम्मेदारी सिर्फ टीका लगवाना और खुद को सुरक्षित करना है।
भारतीय बाल अकादमी की सदस्य डॉ. गुंजन बवेजा का कहना है कि महामारी की पहली और दूसरी लहर में सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव स्कूल जाने वाले बच्चों पर देखा गया है। यह सच है कि बच्चों में संक्रमण की गंभीरता बेहद कम रही लेकिन उस दौर ने उन्हें मानसिक रूप से कमजोर बनाने का काम किया। घर में बंद रहने के दौरान बच्चे तनाव और अवसाद के शिकार हुए हैं इसलिए अभिभावकों से अपील है कि वे ऐसा उपाय करें कि दोबारा ऐसा न हो। इसके लिए सबसे आसान तरीका है बच्चों का कोरोना टीकाकरण कराना। ऐसा कर वे अपने बच्चों को सुरक्षित कल देने का काम तो करेंगे ही साथ ही ये टीका सर्वागीर्ण विकास की भी राह आसान करेगा।
उम्र लक्ष्य प्राप्ति (पहली और दूसरी डोज) प्रतिशत
18 साल से ज्यादा 8,43,000 10,87,499/9,10,229 129/107.97 प्रतिशत