उच्च शैक्षणिक योग्यता के दो अंक जोड़े गए होते तो याची नियुक्ति का हकदार होता
नियुक्ति प्रक्रिया में भाई-भतीजावाद व पक्षपात के आरोपों को हाईकोर्ट ने किया खारिज
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। नायब तहसीलदारों की 1996 में निकाली गई भर्ती को चुनौती देने वाली याचिका पर 24 साल बाद अपना फैसला सुनाते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को नियुक्ति का पात्र माना है। कोर्ट ने लंबी अवधि का हवाला देते हुए भर्ती रद्द करने से इन्कार कर दिया लेकिन याची को मुआवजे का पात्र मानते हुए 5 लाख रुपये देने का आदेश दिया है।
याचिका दाखिल करते हुए गुरदासपुर निवासी रविंदर सिंह ठाकुर ने हाईकोर्ट को बताया था कि पंजाब सरकार ने 1996 में नायब तहसीलदार पद के लिए आवेदन मांगे थे। याचिकाकर्ता ने भी इन पदों के लिए आवेदन किया था। इस भर्ती के लिए परीक्षा दो साल बाद आयोजित की गई और 1999 में मेरिट सूची जारी की गई। इसी मेरिट सूची को चुनौती देते हुए रद्द करने की व याची की नियुक्ति पर विचार करने का निर्देश जारी करने की अपील की गई थी। याचिका में कहा गया था कि राजनेताओं और चयन समिति के सदस्यों के करीबी उम्मीदवारों को भर्ती में चुना गया था। कुछ लोग जो न्यूनतम योग्यता भी पूरी नहीं करते थे, उनका भी चयन कर लिया गया।
हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुएकहा कि याची ने भाई-भतीजावाद और पक्षपात के जो आरोप लगाए हैं, उनको साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं पाए गए। साथ ही पाया कि याचिकाकर्ता को उसकी एलएलबी डिग्री के लिए दो अतिरिक्त अंक आवंटित किए गए थे, जो जोड़े नहीं गए। यदि इन अंकों को जोड़ा गया होता तो वह चयन सूची में मौजूद अंतिम उम्मीदवार से मेरिट में ऊपर होता। कोर्ट ने कहा कि 24 साल पहले पूरी हो चुकी भर्ती में अब दखल सही नहीं है और इतनी लंबी सेवा पूरी करने वालों को निकालने का आदेश नहीं दिया जा सकता। साथ ही याची के लिए पद सृजित करने का अब कोई औचित्य नहीं बनता है। ऐसे में अदालत ने याची की योग्यता गणना में त्रुटियों के कारण अन्यायपूर्ण ढंग से पद से वंचित किए जाने पर उसे पांच लाख रुपये मुआवजा जारी करने का सरकार को आदेश दिया है। कोर्ट ने सरकार को विकल्प दिया है कि वह चाहे तो चयन समिति के सदस्यों से यह राशि वसूल कर सकती है।