चंडीगढ़। पंजाब विश्वविद्यालय सीनेट चुनाव के अंतिम परिणाम चाहे जो हों, लेकिन प्रोफेसर व एसोसिएट-असिस्टेंट प्रोफेसर वर्ग के चुनाव में एक बार फिर गोयल ग्रुप का डंका बज गया। चार में से तीन सीटों पर इस ग्रुप के प्रत्याशी जीते हैं। इस ग्रुप को कांग्रेस समर्थित भी कहा जाता है। एक निर्दलीय प्रत्याशी के सिर जीत का श्रेय बंधा है। वहीं कैंपस से भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया। भाजपा समर्थित प्रत्याशी व रणनीतिकार अपनी हार के कारणों की समीक्षा करने में जुटे हैं।
प्रोफेसर वर्ग में विज्ञान संकाय से गोयल ग्रुप के प्रो. रजत संधीर, निर्दलीय प्रो. एमसी सिद्धू व भाजपा समर्थित प्रो. सुकेश कुमार मैदान में थे। चुनाव से पहले प्रो. सुकेश ने अपना नाम वापस लेने की बात कहकर मुकाबला दोतरफा कर दिया। हालांकि प्रो. सुकेश कुमार को तीन वोट पड़े। वहीं प्रो. रजत संधीर 54 वोट पाकर विजयी हुए। प्रो. सिद्धू को 15 वोट मिले। इसी तरह कला संकाय से भाजपा समर्थित प्रो. संजय कौशिक को 91 वोट मिले। वहीं गोयल ग्रुप के प्रो. जितेंद्र ग्रोवर को 94 मत मिले और वह तीन वोट से जीत गए। निर्दलीय प्रत्याशी प्रो. अक्षय को 62 मत मिले।
एसोसिएट-असिस्टेंट प्रोफेसर वर्ग : डॉ. प्रवीन गोयल व डॉ. दिनेश कुमार जीते
एसोसिएट व असिस्टेंट प्रोफेसर वर्ग के चुनाव में विज्ञान संकाय से प्रो. प्रवीन गोयल 136 वोट लेकर विजयी हुए। उनके विपक्ष में खड़ीं डॉ. सुमन मोर को 40, समरजीत सिहोत्रा को आठ मत मिले। कला संकाय से निर्दलीय प्रत्याशी डॉ. दिनेश कुमार 116 वोट पाकर विजयी बने। वहीं दूसरे नंबर पर भाजपा समर्थित प्रत्याशी डॉ. अजय रंगा 97 वोट पाकर रहे। निर्दलीय डॉ. नवरीत को 27, गोयल ग्रुप के डॉ. प्रवीन कुमार को 67 वोट मिले।
प्रो. नवदीप गोयल का कैंपस में है दबदबा, उन्हीं के प्रयास से जीते तीन सीटें
कांग्रेसी खेमे के प्रो. नवदीप गोयल हर बार की तरह इस बार भी सीनेट चुनाव में सबसे बड़े खिलाड़ी बनकर उभरे। अपने दम पर कैंपस की तीनों सीटों पर कब्जा दिलाया। रातोंरात उन्होंने चुनाव की रणनीति बदली। सूत्रों का कहना है कि उनकी पैंतरेबाजी से ही विज्ञान संकाय से प्रो. सुकेश कुमार को चुनाव से पहले नाम वापस लेने की बात कहनी पड़ी। यदि प्रो. सुकेश कुमार चुनाव से दो दिन पहले नाम वापस करने की बात कहते तो नजारा बदल सकता था। हालांकि प्रो. गोयल ग्रुप ने उसकी भी काट ढूंढ ली थी। अब गोयल ग्रुप अन्य सीटों के लिए गणित लगाने में जुट गए हैं। गोयल ग्रुप इसलिए भी अधिक मजबूती से खड़ा होता है कि उनके पास सीनेट चुनाव का लंबा अनुभव है। एक-एक वोट का गणित वे उंगलियों पर लगा लेते हैं जो भाजपा के लोग नहीं कर पाते।
भाजपा की हार के कई कारण
केंद्र में जब भाजपा की सरकार बनी तो कैंपस के भाजपाइयों को लगा कि अब वे अपना कुनबा यहां बढ़ाएंगे। वीसी भी वहां से तैनात किए गए। धीरे-धीरे भाजपा के सदस्यों की संख्या में इजाफा तो हुआ, लेकिन संख्या 50 पार नहीं पहुंच पाई। इस संख्या को और बढ़ाने के लिए भाजपा से जुड़े सदस्यों ने कांग्रेसी खेमे के कुछ शिक्षकों को पद बांटे। उनकी सिफारिश पर पीयू में उन्हें पद मिले, लेकिन हकीकत में वे भाजपा के नहीं हो पाए। कांग्रेस के शिक्षकों को पद देने से भाजपा के कुछ पुराने सदस्य नाराज हो गए और उसके बाद फूट पड़ती चली गई। पिछले साल के पुटा चुनाव के दौरान भाजपा के चार ग्रुप बन गए। क्षेत्र के अनुसार शिक्षक बंट गए। सूत्रों का कहना है कि भाजपा के यदि वोट एक जगह पड़ जाते और रणनीति ठीक होती तो दो सीटें कैंपस से निकाल सकते थे, लेकिन कुछ भाजपाइयों ने अपने प्रत्याशियों को ही वोट नहीं दिए। हालांकि संगठन के खांटी पदाधिकारी इसकी समीक्षा करके निष्कर्ष निकालेंगे। जानकारों का कहना है कि भाजपा के सभी शिक्षक एक मंच पर जब तक नहीं आएंगे और पुराने पदाधिकारियों से ज्ञान नहीं लेंगे, तब तक भाजपा अपनी पैठ कैंपस में नहीं बढ़ा पाएगी। साथ ही क्षेत्रवार शिक्षक न बंटकर एक समूह में रहें तो उनके लिए बढ़िया रहेगा।