चंडीगढ़। नर्सिंग पेशे का नाम लेते ही एक महिला की छवि सामने आ जाती है, लेकिन अब तेजी से सोच बदल रही है। महिला प्रधान पेशा माने जाने वाले नर्सिंग में अब पुरुषों की सहभागिता तेजी से बढ़ रही है। सेवा भावना के साथ ही जॉब सिक्योरिटी पुरुषों को भी इस क्षेत्र की ओर आकर्षित कर रही है। चंडीगढ़ में यह बदलाव साफ नजर आ रहा है। पीजीआई समेत शहर के अन्य सरकारी अस्पतालों में पुरुष नर्स की संख्या में तेजी से इजाफा दर्ज किया जा रहा है। नर्सिंग के पेशे में आने वाले ज्यादातर पुरुष ऐसे हैं जिन्होंने डॉक्टर बनने का सपना पूरा न होने पर इस क्षेत्र को चुना। वहीं कुछ ने मानवता की सेवा को ही अपने जीवन का उद्देश्य बनाकर इस ओर रुख कर लिया है। इनसेट-
पीड़ा की महसूस, इसलिए बन गया नर्स
पीजीआई नर्सेज वेलफेयर एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष सत्यबीर सिंह डागर का कहना है कि उन्होंने छठी कक्षा से ही तय कर लिया था कि वे नर्स या टीचर ही बनेंगे। सत्यबीर का कहना है कि दिव्यांग होने के नाते उन्होंने उस पीड़ा को महसूस किया है, जब लोगों को किसी के मदद की जरूरत होती है। इसलिए उन्होंने तय किया वे अपनी कमी को भूलकर दूसरों के दुख दूर करने में सहायक बनेंगे। सत्यबीर 17 सालों से पीजीआई में नर्सिंग ऑफिसर के पद पर कार्यरत हैं। इनकी पत्नी कल्पना भी इनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस पेशे में मरीजों की सेवा करने में जुटी हुई हैं।
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बचपन से ही अस्पताल से लगाव, नर्सिंग में आकर सपना हुआ साकार
मुझे बचपन से ही अस्पताल से लगाव था। जब डॉक्टरों को देखता था तो यही सोचता था कि बड़ा होकर डॉक्टर बनूंगा। यह कहना है जीएमएसएच 16 के नर्सिंग ऑफिसर ओम प्रकाश का। पीएमटी में सफल न होने पर उन्होंने नर्सिंग में कॅरियर बनाने का निर्णय लिया। सात साल से बतौर नर्सिंग ऑफिसर कार्य कर रहे ओम प्रकाश का कहना है कि मौजूदा समय में कोई भी काम ऐसा नहीं है जिसमें स्त्री-पुरुष के अनुसार कार्य विभाजन किया जाता हो। इसलिए नर्सिंग से बेहतर और कोई विकल्प नहीं लगा।
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डॉक्टरी की पढाई के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए नर्सिंग चुना
राजस्थान निवासी डबकेश कुमार का चिकित्सा क्षेत्र में कॅरिअर बनाने का सपना था। लेकिन डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए पैसे न होने पर उन्होंने नर्सिंग के जरिए अपना सपना सच करना सही समझा। मेहनत से परीक्षा पास की और सरकारी संस्थान में नर्सिंग की पढ़ाई पूरी कर पिछले 10 साल से जीएमसीएच-32 में काम कर रहे हैं। डबकेश का कहना है कि इस पेशे में सुकून है। दूसरों की मदद कर आत्म संतुष्टि मिलती है। अब स्त्री-पुरुष का वर्गीकरण समाप्त हो चुका है। इसलिए इस पेशे में पुरुष भी आगे बढ़ रहे हैं।
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बदल रही है सोच, अब नर्सिंग कॉलेजों में 30 प्रतिशत सीटें
आमतौर पर महिलाएं प्रसव के दौरान, प्रसव पूर्व, प्रसवोत्तर और प्रसव वार्ड में देखभाल के लिए पुरुष नर्सों की सहायता लेना पसंद नहीं करती हैं। इससे पुरुष नर्स को प्रशिक्षण देना बेहद मुश्किल हो जाता है। पहले इस पेशे को उनके पालन-पोषण की प्रकृति के कारण महिलाओं का पेशा माना जाता था। लेकिन अब अवधारणा तेजी से बदल रही है। पुरुष नर्सों के पास अब नर्सिंग कॉलेजों में 30 प्रतिशत सीटें हैं जो पहले महज 10 प्रतिशत हुआ करती थीं।
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आंकड़ों में दिख रहा बदलाव
अस्पताल महिला नर्स पुरुष नर्स
पीजीआई 1930 410
जीएमसीएच-32 476 272
जीएमएसएच-16 155 15