चंडीगढ़ प्रशासन की अनियोजित कार्यप्रणाली का नमूना देखना है तो जीएमसीएच-32 और सेक्टर-48 के 100 बेड के अस्पताल का दौरा कीजिए। स्थिति साफ हो जाएगी। एक ओर जीएमसीएच-32 में बेड की कमी के कारण मरीजों को इमरजेंसी में स्ट्रेचर पर भर्ती कर इलाज करना पड़ रहा है जबकि इसी अस्पताल से संबद्ध सेक्टर-48 के अस्पताल में दर्जनों बेड खाली पड़े हैं।
सेक्टर-48 में हॉस्पिटल को बनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य 45, 46, 47, 49, 50, 51 जगतपुरा, फैदा, रामदरबार और मोहाली की जनता को स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराना था लेकिन सुविधा शुरू होने के बाद भी इस क्षेत्र की जनता के हाथ निराशा ही लगी है। अब भी चंडीगढ़ के उस क्षेत्र की बड़ी आबादी को इलाज कराने के लिए अपने घर से कई किमी दूर जाना पड़ रहा है। वहीं 48 का अस्पताल उस क्षेत्र की जनता के लिए हाथी का दांत बना हुआ है।
अस्पताल बनाने के बाद यह तय किया गया कि वहां ओपीडी संचालित करने के बजाय जीएमसीएच-32 के तीन विभागों के इनडोर मरीजों को शिफ्ट किया जाएगा लेकिन ये कार्य योजना भी अब तक अधर में है। शिफ्ट किए गए त्वचा, रेडियोथैरेपी और ईएनटी विभाग के मरीजों को इलाज के लिए वापस जीएमसीएच-32 ही भेजा जाता है क्योंकि सेक्टर-48 में ईएनटी के मरीजों की सर्जरी के लिए ओटी नहीं है। वहीं रेडियोथैरेपी के मरीजों को रेडिएशन के लिए जीएमसीउएच-32 भेजा जाता है, क्योंकि इसकी सुविधा भी सेक्टर-48 में नहीं है। ऐसे में अधूरी कार्य योजना का खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है।
सेक्टर-48 के अस्पताल को संचालित करने के लिए 74 डॉक्टर, 161 पैरा मेडिकल स्टाफ, 10 प्रशासनिक स्टाफ, एक ज्वाइंट कंट्रोलर, एक डिप्टी कंट्रोलर और एक सेक्शन अफसर की नियुक्ति की जानी थी लेकिन अब तक तैनाती की प्रक्रिया लंबित है। ऐसे में जीएमसीएच-32 अस्पताल प्रशासन को अपने ही डॉक्टर और स्टाफ वहां तैनात करने पड़ रहे हैं जबकि जीएमसीएच-32 में पहले से 656 नर्सिंग स्टाफ के पद सृजन की प्रक्रिया 14 वर्षों से लंबित है। वहीं तैनात स्टाफ में से दर्जनों पद भी खाली पड़े हुए हैं।
सात करोड़ खर्च करके 100 बेड का अस्पताल बना दिया गया, लेकिन उसका मरीजों को लाभ नहीं मिल रहा। सिर्फ कमीशन के चक्कर में जनता को मूर्ख बनाने का काम हुआ है। प्रशासन चाहे तो सबकुछ कर सकता है लेकिन सेक्टर-48 के अस्पताल के मामले में जान बूझकर अनदेखी की जा रही है। - जेजे सिंह, सेक्टर-48 आरडब्ल्यूए अध्यक्ष
अस्पताल बनने की घोषणा हुई तो क्षेत्रीय लोग बहुत खुश हुए क्योंकि उन्हें इलाज के लिए काफी लंबा सफर तय करना पड़ता है लेकिन अस्पताल बनने के बाद हालात जस के तस हैं। जनता का पैसा लेकर उन्हें ठेंगा दिखा दिया गया। हमारे क्षेत्र में करोड़ों रुपये से बना अस्पताल तीन साल से संचालित है लेकिन उसका लाभ किसे मिल रहा है, यह एक बड़ा सवाल है। - एसके सुखीजा, सेक्टर-48 आरडब्ल्यूए महासचिव
ये तो हमेशा से होता आ रहा है। जनता के नाम पर करोड़ों रुपये स्वीकृत कराए जाते हैं फिर जनता को ही किनारे कर दिया जाता है। सेक्टर-48 के अस्पताल में भी यही खेल खेला गया है। स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर सिर्फ दिखावा हो रहा है। -छिंदा, सेक्टर-45