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Chandigarh: हियरिंग एड के फ्रीक्वेंसी में बदलाव करने से बेहतर हुई सुनने की क्षमता, PGI को शोध में मिली सफलता

Wed, 20 Mar 2024 03:38 PM IST
निवेदिता वर्मा वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

आमतौर पर श्रवण दोष वाले मरीजों में इंप्लांट के बाद कुछ शब्दों को न सुन पाने की समस्या होती है। उन मरीजों में इंप्लांट के शत-प्रतिशत लाभ के सामने न आने पर नया फार्मूला अप्रोच के तहत बदलाव करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए इंप्लांट वाले 30 मरीज का चयन किया गया और उनमें 10 तरह के टेस्ट किए गए।
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हियरिंग एड
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विस्तार
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चंडीगढ़ पीजीआई के ईएनटी विभाग के विशेषज्ञों ने श्रवण दोष वाले मरीजों में कोक्लियर डेड रीजन से जुड़ी परेशानी को दूर करने का फार्मूला तलाश लिया है। 
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इस समस्या से ग्रस्त मरीज में को कोक्लियर इंप्लांट के बाद भी कुछ शब्द को सुनने की क्षमता विकसित नहीं हो पाती है। उस स्थिति को कोक्लियर डेड रीजन कहा जाता है। इस समस्या को दूर करने के लिए पीजीआई की विशेषज्ञों ने इंप्लांट की फ्रीक्वेंसी संबंधी प्रोग्रामिंग का तरीका बदलकर कुछ शब्दों को न सुन पाने की समस्या का समाधान तलाश लिया है।

इस प्रयोग को सत्यापित करने के लिए डॉक्टर ने इस समस्या से ग्रस्त मरीजों पर नया फार्मूला अप्रोच के मानक के तहत प्रयोग किया, जिसमें प्रोग्रामिंग बदलने के बाद उन मरीजों का लगातार 6 महीने तक फॉलोअप किया गया। फॉलोअप के दौरान की गई जांच से पता चला कि उनमें इस बदलाव के कारण डेड रीजन संबंधी समस्या लगभग 98 प्रतिशत तक नियंत्रित हो गई है।
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इस शोध को करने वाले ईएनटी विभाग के डॉ. नूरैन आलम ने बताया कि आमतौर पर श्रवण दोष वाले मरीजों में इंप्लांट के बाद कुछ शब्दों को न सुन पाने की समस्या होती है। उन मरीजों में इंप्लांट के शत-प्रतिशत लाभ के सामने न आने पर नया फार्मूला अप्रोच के तहत बदलाव करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए इंप्लांट वाले 30 मरीज का चयन किया गया और उनमें 10 तरह के टेस्ट किए गए। इस टेस्ट के दौरान प्राप्त परिणामों के आधार पर उनके हियरिंग एड की प्रोग्रामिंग में बदलाव किया गया।

पहले और बाद की स्थिति का किया विश्लेषण
डॉ. आलम ने बताया कि इस शोध में शामिल मरीजों का शोध शुरू करने से पहले और बाद में फ्रीक्वेंसी जांच की गई। इस जांच के आधार पर ही यह पता चला कि फ्रीक्वेंसी की प्रोग्रामिंग में बदलाव करके कुछ शब्द ना सुन पानी वाली समस्या का समाधान किया जा सकता है। सामान्य तौर पर बड़े और बच्चे सभी मरीजों में एक ही फ्रीक्वेंसी तय की जाती है लेकिन अब इस शोध के बाद फ्रीक्वेंसी तय करने से पहले अलग-अलग मानकों पर विश्लेषण कर उसके परिणाम के आधार पर प्रोग्रामिंग किया जा रहा है।
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