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जन्मदिवस विशेष: सुखना लेक पर लगे पीपल के पेड़ को बचाने के लिए नेकचंद ने निकाली थी अनूठी तरकीब

Wed, 15 Dec 2021 02:21 AM IST
पंचकुला ब्‍यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

चंडीगढ़ की पहली सड़क जो प्रेस बिल्डिंग से बस स्टैंड की तरफ जाती है, वह भी नेक चंद ने ही बनवाई है। रॉक गार्डन की जगह उस जमाने में यह पीडब्ल्यूडी का स्टोर हुआ करता था, उसके सामने वाली सड़क भी नेकचंद ने ही बनवाई थी।
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सुखना लेक पर लगा पीपल का पेड़। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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चंडीगढ़ का रॉक गार्डन नेक चंद की रचनात्मकता और कल्पना का एक अद्भुत व उत्कृष्ट प्रतीक है। पद्मश्री से नवाजे गए नेकचंद 15 दिसंबर 1924 को दुनिया में आए तो उनके मां-बाप ने सोचा नहीं होगा कि उनका बेटा पूरे देश के लिए एक मिसाल बनेगा। नेक चंद ने सिर्फ रॉक गार्डन ही नहीं, चंडीगढ़ की पहली सड़क भी बनवाई और सुखना लेक पर मौजूद सबसे बड़े पीपल के पेड़ को कटने से बचाया। बेशक वे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन हमारे दिलों में उनकी यादें हमेशा जिंदा हैं।

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नेक चंद के बेटे अनुज सैनी ने बताया कि सुखना लेक पर वर्तमान में पीपल का जो सबसे बड़ा पेड़ मौजूद है, वह नेक चंद की बदौलत ही है। उन्होंने बताया कि लेक के निर्माण के दौरान वहां मौजूद पेड़ों को काटा जा रहा था। काम कर रहे कर्मचारियों ने कई पेड़ों को काट दिया था। यह पीपल का पेड़ उस समय भी सबसे विशाल था। नेक चंद पेड़ों को बेहद प्यार करते थे। वह इस पेड़ को कटने नहीं देना चाहते थे, तो उन्होंने एक तरकीब निकाली। अंधेरे में उन्होंने पेड़ पर माता की चुनरी बांध दी और वहां पूजा-पाठ का सामान रख दिया। अगले दिन जब कर्मचारी पेड़ को काटने के लिए आए तो वह वहां पहुंच गए और कर्मचारियों को कहा कि इस पीपल के पेड़ के सामने तत्कालीन पंजाब की मुख्यमंत्री की पत्नी पूजा करती हैं। अगर पेड़ कटा तो सभी के लिए मुश्किल हो जाएगी। यह सुनते ही कर्मचारी वहां से हट गए और पेड़ बच गया। आज सुखना लेक पर पीपल का वह पेड़ आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र है।

चंडीगढ़ की पहली सड़क भी नेकचंद ने बनाई

अनुज सैनी ने बताया कि शहर की पहली सड़क जो प्रेस बिल्डिंग से बस स्टैंड की तरफ जाती है, वह भी उनके पिता नेक चंद ने ही बनवाई है। रॉक गार्डन की जगह उस जमाने में यह पीडब्ल्यूडी का स्टोर हुआ करता था, उसके सामने वाली सड़क भी उन्होंने ही बनवाई थी। कहा कि रॉक गार्डन को सिर्फ बेकार सामान जैसे टूटी हुई चूड़ी, चीनी मिट्टी के बर्तन आदि से बने मूर्तियों के लिए नहीं जाना जाए, बल्कि इसको बनाने में जो त्याग किया गया है, उसको जानना चाहिए। उस जमाने में यह पूरा जंगल हुआ करता था। अंधेरा होने के साथ जानवरों का भी काफी डर होता था। इसके बावजूद वह रात में 12-1 बजे तक काम करते थे। रोशनी का तो नामोनिशान नहीं था, अंधेरे में काम करते समय समस्या होती तो वह खराब पड़े टायरों को जलाकर रोशनी करते थे। इस तरह की मेहनत, अगर कोई युवा कर सकता है तो जिंदगी में उसके लिए कुछ भी नामुमकिन नहीं है।

 

नेकचंद का सफरनामा

  • 15 दिसंबर 1924- गुरदासपुर जिले के शकरगढ़ (पाकिस्तान) में जन्म
  • साल 1947-भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद चंडीगढ़ में आ बसे
  • साल 1951-शुरुआती पढ़ाई के बाद पीडब्ल्यूडी में रोड इंस्पेक्टर की नौकरी मिली।
  • साल 1958- गुपचुप तरीके से रॉक गार्डन को बनाने का काम शुरू किया।
  • साल 1976- काफी अड़चनों के बाद आधिकारिक तौर से रॉक गार्डन का उद्घाटन किया गया।
  • साल 1982- सम्मान के लिए सरकार ने एक पोस्टल टिकट जारी की।
  • साल 1984- देश के सर्वोच्च सम्मानों में से एक पद्मश्री से नवाजा गया।
  • 12 जून 2015- कैंसर से पीड़ित 90 वर्षीय नेकचंद का पीजीआई में निधन।
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