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कभी बस से करते थे सफर, आज हैं करोड़पति

Fri, 30 May 2014 03:02 PM IST
अरविंद बाजपेयी/अमर उजाला, चंडीगढ़
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घर में पैसे की किल्लत, बीमार दादा-दादी और तीन भाई बहनों की पढ़ाई का जिम्मा। ऐसे में छोटी सी कमाई से गुजारा करना काफी मुश्किल रहा। इन परिस्थितियों में भी अरविंद वोहरा ने हार नहीं मानी।
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उन्होंने लगन और मेहनत से तैयार कर डाला एक शानदार बिजनेस और सोशल प्लेटफार्म। ऐसा प्लेटफार्म जो अब बच्चों पीड़ित बच्चों का सहार भी बन गया है। अरविंद वोहरा घर से अकेले चले थे और अब उनके साथ है दो हजार कर्मचारियों की फौज।

उन्होंने बताया उनका परिवार सेक्टर-11 चंडीगढ़ में रहता था। पिता मूल रूप से शिमला के निवासी हैं। उन्होंने बताया कि शिमला में उनकी स्कूलिंग हुई। सेंट एडवर्ड्स स्कूल से दसवीं की परीक्षा पास की।
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हिमाचल में इतना काम नहीं था तो मुंबई चले गए। 1987 से लेकर 1992 तक मुंबई में रहे। वहां बीकाम किया, फिर आईसीडब्लूए का इंटरमीडिएट पूरा किया।

महंगाई ने बना दिया माडल
अरविंद वोहरा ने कहा कि मुंबई की महंगाई ने कमरतोड़ थी। उन्होंने कहा कि कई बार ऐसा हुआ कि बसों की छत पर भी सफर करना पड़ता था। महंगाई से निपटने का रास्ता उन्होंने मेहनत को बनाया।

मार्केट रिसर्च का जाब करते और जब समय मिलता तो इवेंट कंपनियों के माध्यम से माडलिंग करते। अरविंद वोहरा ने कहा कि कुछ जमापूंजी बनी तो 1992 में पुणे गए। पुणे में एमबीए (मार्केटिंग) किया।

पहली जाब एचसीएल में
अरविंद वोहरा ने बताया कि एमबीए के बाद वर्ष 1994 में पहला जाब एचसीएल ग्रुप में शुरू किया। फिर सैमसंग, सलोरा जैसे नामी ब्रांड में काम करने का मौका मिला।

उन्होंने कहा कि जब अपना कैरियर शुरू किया था तो यह ठान लिया था कि चालीस साल की उम्र के बाद किसी के लिए नहीं काम नहीं करना है सिर्फ अपना काम करना है।

वर्ष 2008 में अपना काम
अरविंद वोहरा ने कहा कि वर्ष 2008 मे अपनी कंपनी शुरू की। यह कंसल्टेंसी कंपनी थी, जिसमें टेलीकाम कंपनियों के लिए कंसल्टेंसी सर्विसेज प्रदान की जाती थीं। इस काम के करने से संबंध बने। वर्ष 2012 में जिओनी के साथ मिलकर ज्वाइंट वेंचर कंपनी सिंटेक टेक्नोलाजी प्राइवेट लिमिटेड खोली।

बेटे को हो गया कैंसर
अरविंद वोहरा ने बताया उनके बेटे को वर्ष 2011 में ब्लड कैंसर डिटेक्ट हुआ। उनको इसी समय ऐसा लगा कि वह तो किसी तरह बेटे का इलाज करवा लेंगे, लेकिन जो लोग गरीब हैं वह क्या करते होंगे। इसी को देखकर उन्होंने पिता के एनजीओ बंसी विद्यामेमोरियल ट्रस्ट के माध्यम से उन बच्चों के इलाज में मदद करना शुरू किया जो कि कैंसर से पीड़ित हैं।
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