हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में उसने बताया कि वह पैट्रोलिंग पार्टी का हिस्सा था लेकिन शिकायतकर्ता ने आरोप कांस्टेबल राजेश के खिलाफ लगाए थे। राजेश 21 साल से चंडीगढ़ पुलिस में था और इस दौरान उसकी सर्विस बुक में 19 बैड एंट्री थी। किसी भी गवाह ने याची के खिलाफ कुछ नहीं कहा, फिर भी याची को कांस्टेबल राजेश के बराबर सजा दी गई जो गलत है। घटना के वक्त याची को सेवा में केवल एक वर्ष हुआ था और वह अपने से वरिष्ठ कर्मचारी के खिलाफ कुछ नहीं कर सकता था।
हाईकोर्ट ने इन सभी दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता का यह तर्क कि उसे पैसे की मांग के बारे में पता था लेकिन उसके पास अपने वरिष्ठ के आदेश का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था, उसे उत्पीड़न में सह-प्रतिभागी होने से मुक्त नहीं करता है। अनुशासित बल का सदस्य होने के नाते, वह अपनी सेवा के हर कदम पर सत्यनिष्ठा बनाए रखने के लिए बाध्य था। साथ ही यह भी कहा कि कोई भी विवेकशील व्यक्ति इस निष्कर्ष पर पहुंच सकता है कि जब एक टीम के रूप में कोई ड्यूटी पर कार्य करता है तो टीम शिकायत पर कार्रवाई के लिए जिम्मेदार होती है। हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि कानून के रक्षक ने अवैध धन की मांग करके और नागरिक उत्पीड़न का कारण बनकर स्वयं कानून का उल्लंघन किया है।