सत्ताधारी दल होने और जमीनी स्तर पर भाजपा के मजबूत संगठन ने जीत दिलाई है। भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष ओमप्रकाश धनखड़ की अगुवाई में जीत के लिए मंत्रियों और विधायकों तक की जिम्मेदारियां की गईं थीं।
हरियाणा में हुए निकाय चुनावों में कांग्रेस पार्टी के वॉकओवर का सीधा फायदा भाजपा को मिला। सत्ताधारी दल होने और जमीनी स्तर पर भाजपा के मजबूत संगठन ने इस जीत को और आसान कर दिया। कांग्रेस सिंबल पर चुनाव नहीं लड़ने के फैसले के चलते पहले ही निकाय चुनावों से बाहर हो चुकी थी। हालांकि कांग्रेस ने निर्दलियों पर दांव खेला गया, लेकिन एक ही सीट पर कई कांग्रेसी आमने-सामने होने के चलते इसका लाभ भाजपा को मिला।
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हरियाणा में शहरी मतदाताओं को भाजपा का परंपरागत वोट माना जाता है। हरियाणा में पिछले लगभग साढ़े सात साल से भाजपा की सरकार है। चुनाव से पहले भाजपा ने संबंधित निकायों संस्थाओं को लेकर न केवल बैठकें की, बल्कि जमकर प्रचार भी किया। बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की ड्यूटी और मैनेजमेंट ने इस जीत को और आसान कर दिया।
भाजपा के हरियाणा प्रभारी विनोद तावड़े और संगठन मंत्री रविंद्र राजू ने अलग-अलग जिलों में जाकर बैठकें की। इसके अलावा भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष ओमप्रकाश धनखड़ की अगुवाई में जीत के लिए मंत्रियों और विधायकों तक की जिम्मेदारियां की गईं थीं।
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कांग्रेस की कमजोर रणनीति
प्रदेश में पिछले आठ साल से कांग्रेस गुटों में बंटी हुई है। न तो कांग्रेस का जिला और ब्लॉक स्तर पर संगठन तैयार हो पाया है और न ही निकाय चुनावों को लेकर कांग्रेस की ओर से कोई ठोस प्रचार रणनीति तैयार की गई। कांग्रेस के दिग्गज नेता अपने-अपने हलकों और जिलों तक ही सीमित रहे। कांग्रेस की ओर से नगर पालिका और नगर परिषदों में चेयरमैन पदों के लिए एक-एक समर्थक को मैदान में नहीं उतारा गया, बल्कि अलग-अलग गुटबाजी के चलते एक ही सीट पर कांग्रेस समर्थित कई कई दावेदार मैदान में उतर गए। इसी का लाभ भाजपा के प्रत्याशियों को मिला।