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जल्दबाजी में नहीं, सुलझे दिमाग से करें टैक्स प्लानिंग

Sun, 20 Jan 2013 09:26 PM IST
नई दिल्ली/याशीष दहिया
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वित्तीय वर्ष की शुरुआत में निवेश प्लानिंग के साथ ही टैक्स बचाने की योजना भी तैयार कर लेनी चाहिए। यदि हम वित्तीय वर्ष के आखिर में अपनी टैक्स प्लानिंग करते हैं, तो यह सामान्य रूप से कभी ठीक तरह से प्रभावी नहीं हो पाता है।
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इसलिए हमें अपने निवेश के जरिये भविष्य में अधिक रिटर्न हासिल करने की तैयारी के साथ उनके जरिए टैक्स बचाने के पहलुओं पर भी विचार करना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि आप थोड़े बहुत अधिक रिटर्न के लालच में एक बड़ी राशि उस मद में लगा दें, जहां से आपको कोई खास टैक्स की बचत नहीं हो रही है।

टैक्स प्लानिंग बेहतर वित्तीय प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे हमें अपने वित्तीय लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलती है। जितनी जल्द ही हो टैक्स प्लानिंग की शुरुआत कर देनी चाहिए और नियमित तौर पर उसकी समीक्षा करनी चाहिए। ताकि साल के आखिर में वित्तीय दबाव नहीं झेलना पड़े।
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हर साल दिसंबर-जनवरी के करीब हम सभी टैक्स बचाने की कोशिश में कई वित्तीय निर्णय करते हैं। ऐसे में हम कई तरह के अलाभकारी या बेहद कम फायदे वाली योजनाओं में निवेश कर देते हैं। यदि हम टैक्स प्लानिंग को लेकर थोड़ा बहुत पहले से सचेत हो जाते हैं तो इस तरह गलतियों से बच सकते हैं।

सबसे पहले हमें टैक्स स्लैब को समझना जरूरी है। वित्तीय वर्ष 2012-13 में 2 लाख रुपये की आमदनी पर कोई टैक्स नहीं देय है, जबकि 2 से 5 लाख की आय पर करदाता को 10 फीसदी की दर से आयकर चुकाना होगा। जबकि 5 से 10 लाख की आय करदाता को 20 फीसदी और 10 लाख से अधिक आय पर 30 फीसदी आयकर देना होगा। इसके अलावा, 3 फीसदी शिक्षा उपकर भी देय होता है।

आयकर कानून के मुताबिक धारा 80 सी और 80 डी के अंतर्गत करदाता को 1,35,000 रुपये टैक्स में कटौती का लाभ मिलता है। इन दो धाराओं के तहत करदाता को अन्य दूसरी आयकर धाराएं मसलन 80 जी आदि से अधिक करछूट का लाभ मिलता है। धारा 80 सी के अंतर्गत निवेश की सीमा 1 लाख रुपये है। इस तरह, यदि हम इन बातों को ध्यान में रखकर निवेश की योजना बनाएं तो सुरक्षा, रिटर्न के साथ-साथ टैक्स की भी बचत की जा सकती है।

मान लीजिए, दिनेश की सालाना आमदनी 12 लाख रुपये है। उनपर सालाना 2,20,000 रुपये होम लोन की अदायगी की जिम्मेदारी है। साथ ही दिनेश का सालाना पीएफ में निवेश 18,000 रुपये है। इसके अलावा वह पत्नी, बच्चे व स्वयं के लिए स्वास्थ्य बीमा के मद में सालाना 9,000 रुपये का निवेश कर रहे हैं।

दिनेश के परिवार में उनकी पत्नी और सात वर्षीया बेटी के साथ उनके माता-पिता भी रहते हैं, जोकि वरिष्ठ नागरिक की श्रेणी में आते हैं। ऐसे में देखना होगा कि टैक्स बचत के लिहाज से दिनेश का निवेश पोर्टफोलियो कितना संतुलित है।

टैक्स प्लानिंग के लिहाज से उनका 22,000 रुपये का निवेश धारा 80 सी के तहत और 26,000 रुपये का निवेश धारा 80 डी के तहत करछूट के दायरे में आता है। वेतन से होम लोन कि किस्त कटने के बाद दिनेश की कुल कर योग्य आय 10 लाख रुपये से कम बैठती है। इसलिए वह 20 फीसदी आयकर के दायरे में आते हैं।

ऐसे में उन्हें टैक्स की प्लानिंग करते हुए कि उनके लिए कर बचत के लिहाज से कहां-कहां निवेश की संभावनाएं बनती हैं और मौजूदा पोर्टफोलियो में कहां गैप है। इन दोनों बातों को ध्यान में रखते हुए ही बाकी का निवेश करना चाहिए।

दूसरी बात यह कि अगर आप समय रहते अपने नियोक्ता को अपने निवेश संबंधी कागजात नहीं दे पाते, तो बहुत परेशान होने की जरूरत नहीं। टैक्स की कटौती के बाद भी आप आयकर रिटर्न दाखिल कर अपना पैसा वापस पा सकते हैं। इसलिए समय सीमा के दबाव में आकर निवेश में हड़बड़ी दिखाने की जरूरत नहीं है।
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