अधिकारी का कहना है कि मदुरै स्थित त्यागराजन कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में रसायन शास्त्र के प्राध्यापक राजगोपाल वासुदेवन ने सबसे पहले प्लास्टिक कचरे से सड़क बनाने की तकनीक खोजी थी। इसके बाद इस दिशा में और काम हुआ है और अब तो यह स्थापित हो गया है कि गिट्टी में अलकतरा मिलाते वक्त ही प्लास्टिक कचरे की कतरन से बना पेस्ट मिला दिया जाए, तो सड़क निर्माण की लागत न सिर्फ घट जाती है, बल्कि उसकी मजबूती भी बढ़ जाती है। परीक्षण के तौर पर देश के कई हिस्सों में इस तकनीक से सड़कें बन चुकी हैं।
ऐसे तैयार होती है सड़क
सबसे पहले पॉलिथीन के कैरी बैग, प्लास्टिक के कप-ग्लास, नमकीन-भुजिया के पैकेट या रैपर, चॉकलेट-लेमन चूस के रैपर और शैंपू-सॉस आदि के सैशे को बीन कर उसकी सफाई की जाती है। फिर उसे स्रेडर मशीन से एक निश्चित आकार में काट लिया जाता है। उसके बाद उसे 165 डिग्री सेल्सियस तापमान पर गर्म किया जाता है, जिससे तेल जैसा एक पेस्ट तैयार हो जाता है। फिर इसे मिक्सिंग चैंबर में भेज दिया जाता है, जहां गिट्टी में अलकतरे के साथ प्लस्टिक कचरे से तैयार पेस्ट को भी मिला दिया जाता है।
नई मशीनरी की जरूरत नहीं
राजमार्ग मंत्रालय के इंजीनियरों का कहना है कि राजमार्ग निर्माण में इस समय जिन मशीनरी का उपयोग हो रहा है, उसी का इस्तेमाल करते हुए प्लास्टिक कचरे से सड़क बनाई जा सकती है। उसमें सिर्फ प्लास्टिक कचरे को काटने वाले स्रेडर मशीन को लगाना होगा और उसे गर्म करने के लिए एक चैंबर बनाना होगा। बाकी सारी मशीनरी पहले वाली ही होगी।