गौरतलब है कि देश की खुदरा मुद्रास्फीति अप्रैल के दौरान 4.29 फीसदी दर्ज की गई, जो मार्च 2021 में 5.52 फीसदी थी। भारतीय स्टेट बैंक में समूह की मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्या कांति घोष ने इस गिरावट को भ्रामक बताया। उन्होंने अपने एक नोट में भी कहा कि ऐसा खाद्य सामग्रियों की कीमतों में कमी के कारण हुआ, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्र संबंधी मूल मुद्रास्फीति बढ़कर 6.4 फीसदी पर पहुंच गई।
उन्होंने कहा कि पूरे देश में महामारी फैलने के साथ हमें मुख्य मुद्रास्फीति के आंकड़ों से आगे देखने की जरूरत है। ग्रामीण मूल मुद्रास्फीति अप्रैल माह में बढ़कर 6.4 फीसदी पर पहुंच गई। मई 2021 के दौरान इसमें और इजाफा हो सकता है। महामारी के कारण स्वास्थ्य पर बढ़ते खर्च का असर ग्रामीण इलाकों में भी लोगों की जेब पर पड़ेगा।
एसबीआई की सीईओ के मुताबिक, खुदरा मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में शामिल स्वास्थ्य क्षेत्र की वस्तुवार मुद्रास्फीति पर यदि गौर किया जाए तो गैर-संस्थागत दवाओं, एक्स-रे, ईसीजी, पैथालॉजी टेस्ट आदि की मुद्रास्फीति माह-दर-माह बढ़ती जा रही है। उदाहरण के तौर पर समग्र खुदरा मूल्य सूचकांक अप्रैल में कम हुआ। इस दौरान खाद्य सीपीआई में गिरावट आई, लेकिन जब खाद्य वस्तुओं की महंगाई की समग्र तुलना सीपीआई से की जाती है तो खाद्य सीपीआई में दिखने वाली गिरावट हकीकत में उतनी तेज नहीं होती। इसी तरह ईंधन और स्वास्थ्य के मामले में मुद्रास्फीति की वृद्धि इस वक्त अपने चरम पर है। अहम बात यह है कि मूल सीपीआई 0.57 फीसदी घटा, जबकि संबंधित वर्ग में यह 18 अंक बढ़ गया।
गौरतलब है कि कोरोना की वजह से लोगों के मेडिकल खर्चों में काफी इजाफा हुआ है। इसके चलते मेडिकल खर्च 66 हजार करोड़ रुपये तक बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है। एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2020-21 का स्वास्थ्य खर्च 6 लाख करोड़ था।
अनुमानित मेडिकल खर्च
| महंगाई का असर |
15 हजार करोड़ |
| अस्पताल का खर्च |
35 हजार करोड़ |
| आय में कमी |
16 हजार करोड़ |
| खर्च में कुल इजाफा |
66 हजार करोड़ |
| 2020 में कुल खर्च |
6 लाख करोड़ |
| कितना बढ़ा खर्च |
11 फीसदी |
घोष के मुताबिक, मूल्य दबाव का आकलन करने के लिए तीन अहम बिंदु हैं। इनमें स्वास्थ्य, ईंधन मूल्य और उपभोक्ता जिंसों के बढ़ते दाम शामिल हैं। महामारी के चलते स्वास्थ्य खर्च बढ़कर 11 फीसदी तक पहुंच सकता है, जो इस वक्त समग्र मुद्रास्फीति में पांच फीसदी है। इस स्थिति का असर दूसरे सामानों की खपत पर पड़ सकता है। कुल मिलाकर दूसरे सामानों की खपत में कटौती हो सकती है। वहीं, ईंधन के बढ़ते दाम का भी असर स्वास्थ्य व्यय को छोड़कर अन्य खर्चों पर पड़ सकता है।
घोष के मुताबिक, ऐसी स्थिति से बाहर निकलने का रास्ता यही है कि पेट्रोल-डीजल पर कर दरों को तर्कसंगत बनाकर इनके दाम में कटौती की जाए। अन्यथा लोग मेडिकल खर्चों और पेट्रोल-डीजल का इस्तेमाल करने के लिए अपने जरूरी खर्चों को कम करने लगेंगे। उन्होंने बताया कि इस वक्त ऑनलाइन डिलीवरी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल बढ़ रहा है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के आंकड़ों में इनका जिक्र नहीं होता। अगर इन्हें पर भी विचार किया जाए तो खुदरा मुद्रास्फीति पर 10 से 15 अंक का असर पड़ सकता है।