तकनीकी परेशानी
ताइवान की चाओयंग यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नॉलॉजी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. नागेंद्र कुमार शर्मा की टीम ने भारत की बड़ी कंपनियों में रिवर्स लॉजिस्टिक्स की संभावनाओं और उनके सामने आ रही तकनीकी परेशानियों पर एक रिसर्च किया है। इस रिसर्च में यह परिणाम निकलकर आया है कि देश की 24 बड़ी कंपनियों में ज्यादातर के पास रिवर्स लॉजिस्टिक्स की सुविधा नहीं है। ये कंपनियां अपने उपभोग किये जा चुके उत्पादों को वापस लेने के लिए अभी तक कोई नेटवर्क स्थापित नहीं कर सकी हैं।
रिवर्स लॉजिस्टिक्स का सिस्टम स्थापित करने में कंपनी की क्षमता के अनुसार भारी लागत आ सकती है। उपभोग हो चुके उत्पाद को वापस लेना, किसी बड़े भंडार गृह में उसे इकट्ठा करके रखना, इस भंडारण से रखरखाव तक अनेक कर्मचारियों की स्थाई नियुक्ति करना, इसे वापस कंपनी तक पहुंचाना और सबसे अंत में उचित तकनीक से इसे दोबारा रीसायकल कर उपभोग करने लायक बनाने में भारी लागत आ सकती है। इतना करने की बजाय कंपनियां कच्चा माल खरीदकर सीधे नए माल के उत्पादन को आसान समझती हैं।
लेकिन इसमें सबसे बड़ी बाधा कंपनियों के उत्पाद बेचने वाले अंतिम खुदरा व्यापारी में रिवर्स लॉजिस्टिक्स की संभावना के प्रति जागरूकता की कमी का होना है। खुदरा विक्रेताओं को उत्पाद वापस लेने के लिए तैयार करना इसके लिए बड़ी समस्या है। इस संदर्भ में बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारी भी कई बार रिवर्स लॉजिस्टिक्स के लिए स्वप्रेरित नहीं होते। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार इन्हें कुछ आर्थिक लाभ देकर रिवर्स लॉजिस्टिक्स को सफल बनाया जा सकता है।
भारत में मोबाइल, मेडिकल इंडस्ट्री के प्लास्टिक और ऑटो सेक्टर में रिवर्स लॉजिस्टिक्स की शुरुआत हो चुकी है। कुछ कंपनियां इसमें बेहतर काम कर रही हैं। लेकिन इसे बैटरी, टायर, इलेक्ट्रॉनिक्स, प्लास्टिक्स, पॉलीथीन और टेक्सटाइल में बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने की जरूरत है। पर्यावरण में कचरा पैदा करने वाला सबसे बड़ा भाग इन्हीं सेक्टर से आता है। ऑटो सेक्टर में केंद्र सरकार द्वारा लाई गई कबाड़ नीति इसे एक बेहतर परिणाम तक पहुंचाने में मदद करेगी।
नए उत्पादों को रखने की तुलना में पुराने उत्पादों को रखने में लगभग 20 फीसदी ज्यादा जगह की आवश्यकता होती है। इस प्रकार पुराने उत्पादों को स्टोर करके रखना और इसके पीछे आने वाली लागत कंपनियों के लिए अतिरिक्त समस्या का कारण होता है।
रिवर्स लॉजिस्टिक्स में अनुभव
एक समय देश की सबसे बड़ी फोन निर्माता कंपनी नोकिया ने 2013 में अपने अध्ययन में पाया था कि कुल फोन उत्पादन का केवल नौ फीसदी ही रीसायकल होने के लिए वापस आता है। फोन उत्पादों की वापसी की सबसे बड़ी बाधा इसे रीसायकल कर दोबारा उपयोग लायक उत्पादन बनाने की तकनीकी का अभाव होना पाया गया था।
जबकि उपभोक्ताओं ने रिवर्स लॉजिस्टिक्स के प्रति बेहद सकारात्मक प्रतिक्रिया दिखाई थी। सर्वे में शामिल 76 फीसदी उपभोक्ताओं ने कहा था कि यदि उन्हें अपने फोन उत्पाद कंपनी को वापस करने का अवसर मिले तो वे अपने उपयोग किये जा चुके उत्पाद वापस करना चाहेंगे। इसके लिए वे कुछ किलोमीटर चलकर कंपनियों के स्टोर तक पहुंचने को कोई बाधा नहीं मानते थे।
नोकिया ने भारत में 2009, 2010 और 2011 में 12 टन, 27 टन और 60 टन फोन वापस लिए। इसमें लगभग 20 लाख फोन या एक्सेसरीज शामिल थे। इस दौरान कंपनी ने लगभग 13 करोड़ लोगों तक फोन के रिसाइकल संदेश पहुंचाए थे।
आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि जिस प्रकार केंद्र सरकार ने ऑटो सेक्टर में कबाड़ नीति और पीएलआई स्कीम लाकर रिवर्स लॉजिस्टिक्स को बढ़ावा दे रही है, यदि उसी प्रकार दूसरे क्षेत्रों में भी किया जाए तो इसका बेहद सकारात्मक परिणाम निकल सकता है।
बेहतर परिणाम के लिए कड़ाई भी
किसी क्षेत्र के किसी उत्पाद की खरीद के समय उसके रिवर्स लॉजिस्टिक्स के प्रति ग्राहक को सचेत करना या उसके प्रति एक बॉन्ड भरवाना, नए उत्पादों की खरीद के समय इसे दिखाना अनिवार्य करना या इस्तेमाल हो चुके उत्पाद को वापस करने पर आर्थिक छूट देना पर्यावरण में एक बड़े बदलाव का कारण बन सकता है।
आने वाले समय में बड़ा उद्योग
रिसर्च टीम का मानना है कि भारत में रिवर्स लॉजिस्टिक्स बेहद धीमी गति से बढ़ रहा है, लेकिन कुछ ही समय में यह एक बड़ा उद्योग बन सकता है। इसके तेज होने से देश के संसाधनों को बचाने, पर्यावरण को बचाने के साथ-साथ भारी मात्रा में रोजगार भी पैदा किया जा सकता है। यदि कंपनियां थर्ड पार्टी द्वारा भी रिवर्स लॉजिस्टिक्स को बढ़ावा देने की नीति का पालन कर सकती हैं तो इसके लिए उन्हें उचित तकनीकी और माहौल उपलब्ध कराया जाना चाहिए। रिसर्च टीम में डॉ नागेंद्र शर्मा के अलावा डॉ. विमल कुमार, प्रतिमा वर्मा और देश के प्रसिद्ध आर्थिक विशेषज्ञ डॉ. सुनील लूथरा शामिल थे।