डिफॉल्टर कंपनियों से कर्ज वसूली के लिए बना दिवालिया एवं ऋण शोधन अक्षमता कानून (आईबीसी) अपने मूल उद्देश्यों से भटक गया है। आईबीसी पर बनी संसद की वित्तीय स्थायी समिति ने मंगलवार को पेश अपनी रिपोर्ट कहा है कि इस कानून के तहत कर्ज समाधान में न सिर्फ ज्यादा समय लग रहा, बल्कि कर्ज की राशि का 95% तक हेयरकट करना पड़ता है।
समिति के अनुसार, आईबीसी में अब तक हुए कर्ज समाधान के तहत मूल राशि की 10 फीसदी ही वसूली की जा सकी है। कानून में बार-बार हुए बदलावों की वजह से इसका मूल स्वरूप और उदृदेश्य दोनों खत्म हो रहा है। आईबीसी के तहत दिवालिया कंपनियों के कर्ज समाधान को 180 दिन में पूरा करना होता है।
हकीकत ये है कि अभी 13 हजार मामले लंबित हैं, जिनकी समाधान प्रक्रिया 180 दिन से अधिक समय से चल रही है। इन मामलों में करीब 9 लाख करोड़ रुपये फंसे हैं। यह कानून के तहत आए कुल मामलों का करीब 71 फीसदी है, जो समाधान में हो रही लेटलतीफी की वास्तविक तस्वीर पेश करता है।
समाधान पेशेवर की नियुक्ति का बने नियम
स्थायी समिति ने कहा है कि कर्जदाताओं को मूल राशि का 95% तक छोड़ना पड़ता है, जिसका उन्हें भारी नुकसान होता है। आईबीसी बोर्ड को अधिकतम हेयरकट को लेकर कानून बनाने चाहिए।
इसके अलावा कई अनुभवहीन और फ्रेशर्स को समाधान पेशेवर नियुक्त कर दिया जाता है। इनकी नियुक्ति व चयन के लिए भी बोर्ड को मानक बनाना चाहिए। ज्यादा कुशल और पेशेवरों की बड़ी संख्या की भी जरूरत है।
हालिया संशोधन से एमएसएमई को फायदा
आईबीसी संशोधन 2021 के जरिये सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए पहले से तैयार समाधान ढांचा पेश किया जाएगा। इसका लाभ महामारी से प्रभावित एमएसएमई क्षेत्र को मिल सकता है।
समिति ने कहा, बड़ी कंपनियों के मुकाबले छोटे उद्यमों से कर्ज वसूली आसान रहती है। इसमें कर्जदाताओं को ज्यादा हेयरकट की गंुजाइश भी नहीं होती। हालिया संशोधन में पहले से ही समाधान का ढांचा और उसकी राशि आदि तय कर दी जाएगी। इस पर कर्जदाता, उद्यम और पेशेवरों की सलाह के बाद फैसला आसान होगा।