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Old Pension Scheme: क्या है पुरानी पेंशन स्कीम, जिसे लागू करने की मांग पर केंद्र के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन

Mon, 02 Oct 2023 03:40 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Old Pension Scheme: पिछले काफी समय से लोग पुरानी पेंशन स्कीम को फिर से बहाल करने को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। जानकार मानते हैं कि पुरानी योजना के मुकाबले नई पेंशन योजना में कर्मचारियों को काफी कम फायदे मिलते हैं, जिससे उनका भविष्य सुरक्षित नहीं माना जा सकता। यही नहीं, जब नौकरी पूरी हो जाएगी और जो पैसे मिलेंगे उस पर टैक्स भी देना पड़ता है।
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ओल्ड पेंशन स्कीम - फोटो : amarujala.com
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विस्तार
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हम अपनी आजीविका चलाने के लिए कमाई करते हैं। कोई नौकरी करता है, तो कोई अपना बिजनेस करता है। वहीं, जो लोग सरकारी नौकरी करते हैं (केंद्र या राज्य सरकार के कर्मचारी के तौर पर) उन्हें पेंशन देने का प्रावधान है। पिछले कुछ समय से आप ओपीएस यानी ओल्ड (पुरानी) पेंशन योजना और एनपीएस यानी नई पेंशन योजना पर विभिन्न सरकारों और कर्मचारी संगठनों के बीच रार ठनी हुई है। आइए जानते हैं क्या है पुरानी पेंशन स्कीम यानी ओपीएस जिसे कर्मचारी संगठन लागू करने की मांग कर रहे हैं। एनपीएस यानी नई पेंशन स्कीम का विरोध क्यों हो रहा है। 

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क्या है पुरानी पेंशन योजना? 
बात अगर ओल्ड पेंशन योजना की करें, तो इसमें कर्मचारी के सेवा काल के आखिर के  वेतन का 50 फीसदी पेंशन के रूप में आजीवन किया जाता था। इसकी पूरी राशि का भुगतान सरकार की तरफ से किया जाता था। हालांकि, दिवंगत अटली बिहारी वाजपेयी की सरकार ने दिसंबर 2003 में इस पुरानी पेंशन योजना को खत्म कर दिया था। अब उसी पुरानी पेंशन योजना को लागू करने के लिए विभिन्न कर्मचारी संगठन सड़कों पर उतर रहे हैं।

पुरानी पेंशन योजना को कैसे समझें?
केंद्र और राज्यों में सरकारी कर्मचारियों के लिए पेंशन अंतिम आहरित मूल वेतन का 50 प्रतिशत निर्धारित किया गया था। मतलब सेवा के आखिरी दौर में जितना वेतन मिलता था, उसका आधा प्रतिमाह रिटायरमेंट के बाद पेंशन के तौर पर मिलता था। इसके लिए कर्मचारियों के वेतन से कटौती भी नहीं होती थी। 
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उदाहरण के लिए, अगर किसी रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी का सेवा में रहते हुए मासिक मूल वेतन 10,000 रुपये था, तो उसे 5,000 रुपये की पेंशन का आश्वासन दिया जाता था। इसके अलावा सरकार द्वारा सेवारत कर्मचारियों के लिए घोषित महंगाई भत्ते या डीए में बढ़ोतरी का असर भी पेंशनभोगियों के मासिक भुगतान पर पड़ता था। मतलब भत्ते और डीए का लाभ पेंशनभोगियों को भी मिलने लगता था। 

अभी तक सरकार द्वारा भुगतान की जाने वाली न्यूनतम पेंशन नौ हजार रुपये प्रति माह है और अधिकतम 62,500 रुपये है। (केंद्र सरकार में उच्चतम वेतन का 50 प्रतिशत, जो कि 1,25,000 रुपये प्रति माह है)। पुरानी पेंशन योजना यानी OPS को 2004 में बंद कर दिया गया था। इसके बदले नई पेंशन योजना लागू कर दी गई। 

पिछले काफी समय से लोग पुरानी पेंशन स्कीम को फिर से बहाल करने को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। जानकार मानते हैं कि पुरानी योजना के मुकाबले नई पेंशन योजना में कर्मचारियों को काफी कम फायदे मिलते हैं, जिससे उनका भविष्य सुरक्षित नहीं माना जा सकता। यही नहीं, जब नौकरी पूरी हो जाएगी और जो पैसे मिलेंगे उस पर टैक्स भी देना पड़ता है। यही सब वजह है कि कर्मचारी संगठन पुरानी पेंशन योजना का विरोध कर रहे हैं।

आरबीआई के शोधपत्र में पुरानी पेंशन योजना पर क्या कहा गया?
वहीं दूसरी ओर सरकार का मत इसके उलट है। आरबीआई के एक शोध पत्र में कहा गया है कि पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) के मामले में राजकोषीय बोझ नई पेंशन योजना से 4.5 गुना तक अधिक हो सकता है।    राज्यों का पुरानी पेंशन योजना पर वापस लौटना पीछे की ओर कदम रखने जैसा है। यह मध्यम से लंबी अवधि में राज्यों के वित्तीय स्थिति को अस्थिर कर सकता है।

गौरतलब है कि हाल में राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, पंजाब एवं हिमाचल प्रदेश ने पुरानी पेंशन को लागू करने का फैसला किया था। लेख में कहा गया है कि ओपीएस में परिभाषित लाभ हैं, जबकि एनपीएस में योगदान परिभाषित है। ओपीएस में अल्पकालिक आकर्षण है। वही मध्यम से लंबे समय में यह राज्यों के लिए एक चुनौती बन सकता है।

पुरानी पेंशन को लेकर रैली। - फोटो : ANI
पुरानी पेंशन योजना लागू करना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण क्यों?
राज्य 2040 तक ओपीएस पर वापस लौटने से वार्षिक पेंशन खर्च में सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.1 प्रतिशत बचाएंगे। लेकिन 2040 के बाद वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद के 0.5 प्रतिशत तक पेंशन खर्च में औसत अतिरिक्त वृद्धि करनी होगी। लेख में चेतावनी दी गई है कि राज्यों का ओपीएस पर वापस लौटने से लंबी अवधि में उनके राजकोषीय तनाव को अस्थिर स्तर तक बढ़ा सकता है। 

पुरानी पेंशन योजना से सरकार को क्या समस्या है?
  • मुख्य समस्या यह थी कि पेंशन की देनदारी अनफंडेड रही। मतलब आय का कोई जरिया नहीं था और भुगतान की राशि में लगातार इजाफा होते जा रहा था। 
  • भारत सरकार के बजट में हर साल पेंशन के लिए प्रावधान किया जाता है। भविष्य में साल दर साल भुगतान कैसे किया जाए, इस पर कोई स्पष्ट योजना नहीं थी।  
  • एक तरफ पेंशन की देनदारियां बढ़ती जा रही थीं तो दूसरी ओर हर साल पेंशनर्स को दी जाने वाली सुविधाओं में भी बढ़ोतरी। मतलब महंगाई भत्ता, डीए से पेंशन भुगतान की राशि में और भी इजाफा होने लगा था। 
  • पिछले तीन दशकों में केंद्र और राज्यों के लिए पेंशन देनदारियां कई गुना बढ़ गई। 1990-91 में केंद्र का पेंशन बिल 3,272 करोड़ रुपये था और सभी राज्यों के लिए कुल व्यय 3,131 करोड़ रुपये था। 2020-21 तक, केंद्र का बिल 58 गुना बढ़कर 1,90,886 करोड़ रुपये हो गया। राज्यों के लिए यह 125 गुना बढ़कर 3,86,001 करोड़ रुपये हो गया।                                                                                                    
 
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पेंशन देने का फार्मूला तय(सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला
अब समझ लेते हैं नई पेंशन योजना क्या है?
सरकार ने नई पेंशन योजना को साल 2004 में शुरू किया था। इसके तहत सरकारी कर्मचारियों को निवेश की मंजूरी मिलती है, जिसके तहत वो अपने पूरे करियर में पेंशन खाते में नियमित तौर पर योगदान करके अपने पैसे के निवेश को अनुमति दे सकते हैं। यही नहीं, एनपीएस में जब कर्मचारी का रिटायरमेंट हो जाता है, तो इसके बाद उसे पेंशन राशि का एक हिस्सा एकमुश्त निकालने की छूट मिलती है। वहीं, बाकी रकम के लिए एन्युटी प्लान खरीद सकते हैं। यहां समझ लें कि एन्युटी एक तरह का इंश्योरेंस प्रोडक्ट है, जिसमें एकमुश्त निवेश करना होता है और आप इसे हर महीने, 3 महीने में या साल भर में निकाल सकते हैं।

रिटायर्ड कर्मचारी की मृत्यु होने तक उसे नियमित आमदनी मिलती है। जबकि, अगर उसकी मृत्यु हो जाए, तो पूरा पैसा नॉमिनी को मिल जाता है। पुरानी पेंशन योजना बहाली संयुक्त मंच के राष्ट्रीय संयोजक व ऑल इंडिया रेलवे मेन्स फेडरेशन के महामंत्री कामरेड शिव गोपाल मिश्रा के अनुसार 1 जनवरी, 2004 के बाद सरकारी सेवा में आये कर्मचारियों के लिए न्यू पेंशन स्कीम (एनपीएस) एक छलावा साबित हुई है। जो भी कर्मचारी सेवानिवृत्त हो रहे हैं, उनके साथ भारी अन्याय हो रहा है।
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