पेट्रोलियम पदार्थों पर प्रत्येक राज्य अपनी दरों के अनुसार कर वसूलता है। केंद्रीय उत्पाद शुल्क के अलावा राज्यों के कर व स्थानीय कर शहरों द्वारा वसूले जाते हैं। दिल्ली के उदाहरण से इसे समझते हैं। 16 मई को दिल्ली में पेट्रोल करीब 92.58 रुपये लीटर था। इंडियन ऑयल का इस दिन आधार मूल्य 34.19 रुपये लीटर था। इस पर 0.36 रुपये लीटर ढुलाई खर्च जुड़ा।
इस तरह डीलर को 34.55 रुपये प्रति लीटर में पड़ा। इसके बाद इस पर उत्पाद शुल्क भी लगा 32.89 रुपये लीटर, डीलर का कमीशन लगा 3.77 रुपये लीटर, 22 फीसदी दिल्ली सरकार का वैट करीब 21.36 रुपये लगा। इस तरह सब मिलाकर प्रति लीटर का अंतिम बिक्री मूल्य हो गया 92.578 रुपये लीटर।
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार गत वर्ष दिसंबर में पेट्रोल के आधार मूल्य पर दिल्ली में केंद्र व राज्य 180 फीसदी कर वसूलते थे, जबकि डीजल पर 141 फीसदी। दूसरी और जर्मनी में 65 फीसदी ईंधन पर कुल 65 फीसदी और इटली में मात्र 20 फीसदी कर वसूला जाता है।
देश में बीते छह सालों में केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल से कमाई 307 फीसदी तक बढ़ा ली है। सरकार की कमाई का यह बड़ा जरिया बना हुआ है। इस बीच शनिवार को मुंबई व भोपाल में पेट्रोल के दाम 100 रुपये लीटर के पार पहुंच गए।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले तीन सालों में पेट्रोल-डीजल से सरकार को टैक्स से कमाई तीन गुना से ज्यादा तक बढ़ चुकी है। अप्रैल 2020 से जनवरी 2021 के बीच सरकार ने तेल पर टैक्स के माध्यम से 2.94 लाख करोड़ रुपये का राजस्व जुटाया है।
इस दौरान विश्व बाजार में कच्चे तेल की कीमतें नीचे आईं, इसके बाद भी इस पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी जारी रही। 2020-21 में यह 12.2 फीसदी तक पहुंच गया, जबकि 2014-15 में यह 5.4 फीसदी था।
बीते दिनों लोकसभा में वित्त मंत्री अनुराग ठाकुर ने एक सवाल के जवाब में बताया था कि पिछले छह सालों में पेट्रोल और डीजल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क के माध्यम से कुल कर संग्रह में 307.3 फीसदी की वृद्धि हुई है। इसमें अकेले पेट्रोल से कर संग्रह 206 फीसदी और डीजल से 377 फीसदी बढ़ा है।