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Hindenburg: 'हिंडनबर्ग के आरोपों की न्यायिक जांच हो', मंत्रालय के पूर्व अधिकारी ने सीतारमण को पत्र लिख की मांग

Mon, 12 Aug 2024 07:56 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Hindenburg: वित्त मंत्रालय में सचिव (1999 से 2000 के बीच) के रूप में कार्य कर चुके सरमा ने वित्त मंत्री को पत्र लिखकर पूछा है कि क्या नियामक (सेबी) ने संभावित हितों के टकराव के बारे में वित्त मंत्रालय को सीधे तौर पर बताया था और क्या नियुक्तियों पर कैबिनेट समिति को सूचित किया गया था?
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हिंडनबर्ग रिसर्च - फोटो : amarujala.com
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विस्तार
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पूर्व नौकरशाह ईएएस सरमा ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखकर अदाणी प्रकरा में सेबी अध्यक्ष पर लगे हितों के टकराव के आरोपों की न्यायिक जांच की मांग की है। 
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वित्त मंत्रालय के पूर्व अधिकारी ने सेबी अध्यक्ष माधबी पुरी बुच के खिलाफ अमेरिकी शॉर्ट-सेलर हिंडनबर्ग रिसर्च की ओर से लगाए गए आरोपों को बेहद परेशान करने वाला बताया। उन्होंने कहा कि सेबी को छोड़कर सरकार और उसकी एक स्वतंत्र एजेंसी की ओर से आरोपों की तथ्यात्मक सत्यता का पता लगाया जाना चाहिए। 

हिंडनबर्ग ने शनिवार को आरोप लगाया था कि सेबी की चेयरपर्सन माधबी पुरी बुच और उनके पति ने बरमूडा और मॉरीशस में अस्पष्ट ऑफशोर फंड्स में अघोषित निवेश किया था 
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वित्त मंत्रालय में सचिव (1999 से 2000 के बीच) के रूप में कार्य कर चुके सरमा ने पूछा कि क्या नियामक (सेबी) ने संभावित हितों के टकराव के बारे में वित्त मंत्रालय को सीधे तौर पर बताया था और क्या नियुक्तियों पर कैबिनेट समिति को सूचित किया गया था?

उन्होंने कहा, "यदि हिंडनबर्ग की ओर से लगाए गए आरोप तथ्यात्मक रूप से सही पाए जाते हैं, तो सेबी की ओर से पिछले कुछ वर्षों के दौरान सेबी की ओर से की गई सभी जांचों की फिर से जांच की जानी चाहिए।

पूर्व अधिकारी ने मांग की कि सरकार भारत के मुख्य न्यायाधीश से न्यायपालिका के एक वरिष्ठ सदस्य को जांच आयोग का प्रमुख नियुक्त करने का अनुरोध करे क्योंकि केवल ऐसी नियुक्ति ही "सार्वजनिक विश्वास को बनाए रखने और सार्वजनिक विश्वास प्राप्त करने के उद्देश्य की पूर्ति कर सकती है"। 

उन्होंने कहा, "जांच आयोग की कार्यवाही सार्वजनिक डोमेन में होनी चाहिए और इसकी रिपोर्ट समयबद्ध तरीके से संसद को प्रस्तुत की जानी चाहिए।" सरमा ने कहा, "ऐसे आरोपों की जांच के मामले में सत्ताधारियों को सचेत रहकर ध्यान रखना चाहिए कि वे किसी भी वैधानिक संस्था की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप न करें। इस तरह के हस्तक्षेप से उस संस्था के प्रति जनता का विश्वास और उसकी विश्वसनीयता खत्म हो जाएगी।"
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