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वो तानाशाह, जिसने एक डर की वजह से अपने देश में बनवाए थे 13 हजार बंकर

Mon, 27 Jan 2020 10:41 AM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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अल्बानिया में बने बंकर - फोटो : Social media
बंकर अक्सर सरहदों पर मिलते हैं, जो दुश्मनों के हमले से किसी देश की हिफाजत और मोर्चेबंदी का काम करते हैं। पर, दुनिया में एक देश ऐसा भी है, जहां कदम-कदम पर बंकर मिलते हैं। इस देश का नाम है अल्बानिया। इसी देश में मदर टेरेसा का जन्म हुआ था। पर, कई दशकों के कम्युनिस्ट शासन के दौरान ये मुल्क बाकी दुनिया से पूरी तरह से अलग-थलग रहा। इसके वामपंथी तानाशाह एनवर होक्सहा को दुश्मनों का ऐसा खौफ हुआ कि उसने पूरे देश में बंकर बनवा डाले।

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अल्बानिया में बने बंकर - फोटो : Social media
अल्बानिया के गाइड एल्टन कॉशी मजाक में कहते हैं कि आज ये बंकर टूरिज्म के विस्तार का जरिया बन गए हैं। यूं तो अल्बानिया का हजारों साल पुराना इतिहास है। पर आज चालीस साल पुराना इतिहास, हजारों साल की विरासत पर भारी पड़ रही है। आप अल्बानिया के एड्रियाटिक तट से देश के भीतरी हिस्से की तरफ बढ़ें, तो कदम-कदम पर बंकर बने हुए दिखेंगे। दीवारों के ऊपर गोलाकार ताज सा रखा हुआ है।
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अल्बानिया का तानाशाह एनवर होक्सहा - फोटो : Social media
ये बंकर 1970 के दशक में बनाए गए थे। उस वक्त अल्बानिया दुनिया से पूरी तरह से कटा हुआ देश था। इन्हें बनाने की सनक तानाशाह एनवर होक्सहा को उस वक्त चढ़ी, जब अल्बानिया के रिश्ते सोवियत संघ से खराब हो गए। एनवर को लगता था कि पड़ोसी देशों युगोस्लाविया और यूनान से लेकर अमेरिका और सोवियत संघ तक, हर मुल्क उनके वतन पर चढ़ाई करने वाला है। इसी डर से एनवर होक्सहा ने पूरे देश की हिफाजत के लिए बंकर बनवाने शुरू कर दिए। 

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अल्बानिया में बने बंकर - फोटो : Social media
ये बंकर व्लोर की खाड़ी से लेकर राजधानी तिराना की पहाड़ियों तक पर बनाए गए हैं। मोंटेनीग्रो की सीमा से लेकर यूनान के द्वीप कोर्फू तक ये बंकर बने हुए हैं। मोटे अंदाजे के मुताबिक, पूरे देश में करीब पौने दो लाख बंकर एनवर होक्सहा के राज में बनवाए गए थे। आज भी ये बंकर पूरे देश में बिखरे हुए हैं। पहाड़ियों से लेकर खेतों तक, हाइवे से लेकर समुद्र तट तक बंकरों का बोलबाला है। 
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अल्बानिया में बने बंकर - फोटो : Social media
कहा जाता है कि एक बंकर बनाने में दो बेडरूम का मकान बनाने के बराबर खर्च आया होगा। इन्हें बनाने की वजह से ही अल्बानिया यूरोप का सबसे गरीब देश बन गया। इन बंकरों की ऐसी आर्थिक विरासत बनी जिसका बोझ अल्बानिया के लोग आज भी उठा रहे हैं। असल में एनवर होक्सहा ने अपने देश के लोगों को एक मंत्र दिया था-हमेशा तैयार रहो। उसका ये मिजाज दूसरे विश्व युद्ध में मिले तजुर्बे से बना था। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अल्बानिया को इटली की सेना ने केवल पांच दिन में हरा दिया था। हालांकि, इटली के कब्जे का विरोध अल्बानिया के लोगों ने छापामार लड़ाई के जरिए जारी रखा था। युगोस्लाविया और ब्रिटेन-अमेरिका की मदद से अल्बानिया के लोगों ने इटली और जर्मनी की सेनाओं पर हमले जारी रखे। इस छापामार लड़ाई के अगुवा एनवर होक्सहा ही थे। जैसे-जैसे मित्र देशों की सेनाएं धुरी राष्ट्रों यानी जर्मनी और इटली पर भारी पड़ने लगीं, अल्बानिया के बागी भी ताकतवर होते गए।
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एनवर होचा - फोटो : Social media
नवंबर 1944 में अल्बानिया फासीवादी ताकतों से आजाद होने में कामयाब हो गया। इस जीत का श्रेय जैसे-तैसे जुटाई गई 70 हजार लोगों की वामपंथी सेना को जाता है। दूसरे विश्व युद्ध के खात्मे के बाद एनवर होक्सहा ने सारी सत्ता अपने हाथ में समेट ली और तानाशाह बन गए। हर विरोधी का खात्मा कर दिया गया। पहले एनवर ने सोवियत संघ के पाले में जाने का फैसला किया। लेकिन, दूसरे देशों से अल्बानिया के संबंध लगातार बिगड़ते गए। 1947 में अल्बानिया ने युगोस्लाविया से रिश्ते तोड़ लिए। एनवर का मानना था कि युगोस्लाविया के लोग समाजवाद के रास्ते से भटक रहे हैं। 

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अल्बानिया में बने बंकर - फोटो : Social media
1961 में जब सोवियत संघ के नेता निकिता ख्रुश्चेव बने, तो एनवर ने सोवियत संघ से भी रिश्ते तोड़ लिए। इसके बाद वो माओ त्से तुंग के चीन के करीब गए। मगर, ये दोस्ती भी ज्यादा दिन तक नहीं चली। जब माओ ने 1972 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को बीजिंग आने का न्यौता दिया, तो एनवर होक्सहा ने चीन से भी ताल्लुक खत्म कर लिया। 1978 तक चीन ने अल्बानिया से अपने सभी सलाहकार वापस बुला लिए थे। इसके बाद अलग-थलग पड़े एनवर होक्सहा को हर वक्त दुश्मनों के हमले की फिक्र सताने लगी। तभी उसने पूरे देश में बंकर बनाने का फरमान जारी किया। एनवर को लगता था कि नैटो देशों की सेनाएं पड़ोसी यूनान से अल्बानिया पर हमला कर देंगी। उसे युगोस्लाविया पर भी शक रहा आता था। एनवर को आशंका थी कि सोवियत संघ भी बुल्गारिया के रास्ते उस पर हमला कर सकता है। 

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अल्बानिया में बने बंकर - फोटो : Social media
अगर कोई भी देश हमला करता, तो अल्बानिया की छोटी सी सेना उनके सामने टिक नहीं पाती। इसीलिए एनवर होक्सहा ने तय किया कि वो जनता की मदद से संभावित हमले का मुकाबला करेगा। हर नागरिक के लिए सैन्य ट्रेनिंग अनिवार्य कर दी गई। ताकि जरूरत पड़ने पर एक सेना तुरंत खड़ी की जा सके। इस सेना को छुपने के लिए ठिकाने चाहिए थे, ताकि वो विरोध की मुहिम जारी रख सकें। इसीलिए एनवर ने देश के हर हिस्से में छोटे-बड़े बंकर बनाने शुरू कर दिए। सिर्फ एक या दो लोगों के रहने लायक बंकरों को क्यूजेड (केन्डर जजारी या फायरिंग पोजिशन) कहा गया। इन्हें कंक्रीट से तैयार किया गया था। 

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अल्बानिया में बने बंकर - फोटो : Social media
क्यूजेड बंकरों का डिजाइन जोसिफ जगाली ने तैयार किया था। वो दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अल्बानिया की बागी सेना का हिस्सा रहे थे। बंकर के ऊपर एक गुंबद लगाकर इसे खास आकार दिया गया। क्यूजेड को छोटे-छोटे इसलिए बनाया गया था, ताकि दो-दो की तादाद में लोग हमलावर सेना का मुकाबला कर सकें और एक-दूसरे की हिफाजत भी। इसके अलावा पीजेंड यानी पाइक जजारी या फायरिंग प्वाइंट नाम से बड़े बंकर भी बनाए गए थे। ये आठ मीटर से भी ज्यादा चौड़े थे। युद्ध की सूरत में ये बंकर कमांड पोस्ट का काम करने वाले थे। इससे भी बड़े बंकर एनवर ने बनवाए थे, जो जनता की सुरक्षा के ठिकानों का काम करते।

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अल्बानिया में बने बंकर - फोटो : Social media
ये अंडरग्राउंड बंकर सैकड़ों लोगों को अपने अंदर छुपा सकते थे। अल्बानिया की राजधानी तिराना से थोड़ी दूरी पर स्थित गिजिरोकास्टेर नाम के कस्बे में सैकड़ों लोगों के रहने के लिए जमीन के भीतर ठिकाना बनाया गया था। अल्बानिया के बुरेल शहर के रहने वाले पेलम्ब दुराज इन बंकरों के बनाने के अभियान में शामिल थे। वो 1973 में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर के सेना में शामिल हो गए थे। दुराज कहते हैं कि उनके पास कोई और विकल्प नहीं था। दुराज बताते हैं कि अल्बानिया के पास अपनी हिफाजत का इंतजाम करने के सिवा कोई और विकल्प नहीं था। वो दौर शीत युद्ध का था, दुनिया दो ध्रुवों में बंटी हुई थी और अल्बानिया ने सोवियत ब्लॉक यानी वॉर्सा समझौते से खुद को अलग कर लिया था। 

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अल्बानिया में बने बंकर - फोटो : Social media
अल्बानिया ने बंकर बनाने का अभियान 1975 से शुरू किया, जबकि उसने सोवियत संघ से अलगाव 1968 में ही कर लिया था। बीच के सात साल तक अल्बानिया के विशेषज्ञों ने देश की सुरक्षा के लिए तमाम विकल्पों का अध्ययन किया। तय ये हुआ कि बंकरों के अलग-अलग हिस्से बनाकर उन्हें एक जगह ले जाया जाए और फिर इकट्ठा कर के बंकर का रूप दिया जाए। पेलम्ब दुराज की टीम को 13 हजार बंकर बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी। ये इतना बड़ा अभियान था कि अल्बानिया के हर कारखाने में बंकर का सामान तैयार किया जा रहा था। सीमेंट की फैक्ट्रियों में पहले से तैयार कंक्रीट के टुकड़े बनाए जा रहे थे। सेना के मजदूर इन्हें जुटाकर बंकर का रूप देते। 

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अल्बानिया में बने बंकर - फोटो : Social media
1974 में चीन की मदद से स्टील का नया कारखाना लगाया गया। पेलम्ब दुराज कहते हैं कि शुरुआत में गांवों के लोगों को इस अभियान से जोड़ने में बहुत दिक्कत आई। पर, बाद में पूरा देश ही इस काम में लग गया। सरकारी कंपनियां, आम जनता, परिवहन की सरकारी कंपनी से लेकर सेना तक इस अभियान में लगी। सैनिकों ने बंकरों को बनाने के लिए मजदूरी तक की। छोटे बंकरों यानी क्यूजेड के अलावा ऐसे बंकर भी बनाए गए, जो बड़ी तोपों के हमले भी झेल सकें। इसके अलावा गोला-बारुद रखने के लिए भी बंकर बनाए गए थे। दो बंकरों के बीच संवाद के लिए जमीन के भीतर सुरंगें भी बनाई गई थीं। इनके अलावा बंकरों को सप्लाई करने के लिए ईंधन टैंक, खाना-पीना रखने के ठिकाने और केमिकल रखने के अड्डे भी तैयार किए गए थे। 

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अल्बानिया में बने बंकर - फोटो : Social media
कई बार तो बने हुए बंकर उखाड़कर दूसरी जगह लगाए गए। पहाड़ों पर बने बंकरों को टुकड़ों में खच्चरों और इंसानों की मदद से ले जाया गया। सबसे भारी हिस्सा एक क्विंटल तक का होता था। इन्हें लोहे और सीमेंट से जोड़ा जाता था। दुराज जैसे इंजीनियर वो काम कर रहे थे, जैसा पहले कभी नहीं हुआ था। बंकर बनाने में सेना के 80 फीसदी संसाधन लगा दिए गए थे। देश की रक्षा को हर नागरिक का सबसे बड़ा कर्तव्य घोषित कर दिया गया था। एनवह होक्सहा का कहना था कि इस तैयारी में बहाया गया पसीना, युद्ध में खून बहने से रोकेगा। 

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अल्बानिया में बने बंकर - फोटो : Social media
बंकर बनाने का काम हर मौसम में जारी रहता था। सेना के ट्रक और ट्रैक्टर बंकरों के टुकड़ों को खींचकर ठिकाने पर पहुंचाते। फिर उन्हें जोड़कर नया बंकर तैयार किया जाता। इस दौरान बहुत से लोगों की मौत भी हुई। अल्बानिया में कम्युनिस्ट शासन खत्म होने के बाद बंकरों की उपयोगिता खत्म हो गई। आज इनके टुकड़ों को लोग अपने घरों में सजाने के लिए रखते हैं। खेतों में बने बंकर उखाड़कर खेती की जा रही है। लोग अब सवाल पूछ रहे हैं कि क्या अल्बानिया को वाकई बाहरी हमले का इतना खतरा था कि देश के बहुमूल्य संसाधन बंकर बनाने में झोंक दिए गए? 

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अल्बानिया में बने बंकर - फोटो : Social media
बंकरों का सामान तैयार करने वाले कारखाने आज वीरान हैं। इसके कबाड़ को बेचने का रोजगार खूब फल-फूल रहा है। यही काम करने वाले एडी कहते हैं कि कई बार उन्हें बंकर तोड़ने का ठेका भी मिलता। वो पहाड़ों में जाकर बने बंकर तोड़ा करते हैं। एडी बचपन में इन बंकरों में छुपकर जर्मन फौजियों को मारने के खेल खेला करते थे। अब इन बहुत से बंकरों में सांपों का डेरा है। ऐसे ही एक बंकर में 2004 में मस्टर्ड गैस मिली थी। इसे नष्ट करने के लिए अमेरिका ने अल्बानिया को दो करोड़ डॉलर दिए थे। कई बंकर अब बेघर लोगों के ठिकाने बन गए हैं, तो इनके टुकड़े घरों की शान बढ़ाते हैं। 
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अल्बानिया में बने बंकर - फोटो : Social media
बड़ी तादाद में विदेशी सैलानी बंकरों वाले इस देश में घूमने आते हैं। ऐसे ही एक शख्स हैं डेविड गलजार्ड, जो नीदरलैंड के रहने वाले हैं। उन्होंने बड़े पैमाने पर बंकरों की तस्वीरें ली हैं। इन तस्वीरों की मदद से वो दुनिया को अल्बानिया आने का न्यौता देते हैं। उन्हें ये बंकर शीत युद्ध के ज़ख्म जैसे लगते हैं। जो काले वामपंथी तानाशाही दौर की याद दिलाते हैं। आज कॉशी जैसे गाइड इन्हीं बंकर की मदद से रोजी कमाते हैं। शीत युद्ध के जख्म जितने खुले तौर पर अल्बानिया में दिखते हैं, वैसे कहीं और नहीं दिखते। पिछले पंद्रह सालों में इन में से कई के नामो-निशां मिट चुके हैं। आधे से ज्यादा बंकर अब खत्म हो चुके हैं। अगले एक दशक में बहुत से और बंकरों के खत्म हो जाने का अंदेशा है। जिन लोगों ने ये बंकर बनाए, वो एनवर होक्सहा की सनक के शिकार हुए थे। अल्बानिया के लोग कहते हैं कि जब दुनिया रॉकेट बना रही थी, तब हम बंकर बना रहे थे। ये पागलपन के सिवा कुछ और नहीं।  
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