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हालात ने ली जान: पिता ने चार दिव्यांग बेटियों के साथ दिल्ली में की आत्महत्या, छपरा में भी मातम

Sat, 28 Sep 2024 05:55 PM IST
हिमांशु प्रियदर्शी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छपरा

सार

Chapra News: घटना को लेकर ग्रामीणों का कहना है कि हीरालाल एक मेहनती और धैर्यवान व्यक्ति था, लेकिन हालात ने उसे इतना तोड़ दिया कि उसने अपने जीवन का अंत कर लिया। पढ़ें पूरी खबर...।
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मृतक के बुजुर्ग पिता सदमे से हुए बेहोश - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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दिल्ली के वसंत कुंज स्थित रंगपुरी गांव में एक दिल दहला देने वाली घटना घटी, जहां सारण जिले के मसरख थानाक्षेत्र के घोघिया गांव के निवासी हीरालाल शर्मा (42) ने अपनी चार दिव्यांग बेटियों के साथ मिलकर आत्महत्या कर ली। गुरुवार रात को जहरीला पदार्थ खाने के बाद शुक्रवार को पुलिस ने दरवाजा तोड़कर पांचों शवों को बाहर निकाला। घटना की खबर मिलते ही मृतक के पैतृक गांव घोघिया में मातम का माहौल छा गया। उनके बुजुर्ग पिता मरई शर्मा सदमे से बेहोश हो गए। 

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पत्नी की मौत के बाद बिखर गई थी जिंदगी
हीरालाल शर्मा पिछले 30 वर्षों से दिल्ली में रहकर मेहनत-मजदूरी कर अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे थे। उनका जीवन शुरू से ही परेशानियों से भरा रहा। उन्हें चार दिव्यांग पुत्रियों का पिता होने का दर्द सहना पड़ा और उनकी पत्नी सुनीता देवी भी कैंसर से पीड़ित थीं। पत्नी की 10 महीने पहले मौत के बाद हीरालाल की जिंदगी एकदम से बिखर गई थी। उनकी चारों बेटियां नीतू (18), निशी (15), नीरू (10) और निधि (8) शारीरिक रूप से असमर्थ थीं और पूरी तरह से हीरालाल पर निर्भर थीं। 

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16 साल से घर नहीं गए थे हीरालाल
हीरालाल का गांव से नाता पिछले 16 साल से लगभग टूट चुका था। वह आखिरी बार 2008 में अपनी मां की मृत्यु पर गांव आए थे। उसके बाद वह कभी घर नहीं लौटे। परिवार के चार भाइयों में सबसे बड़े हीरालाल का जीवन एक संघर्षमय यात्रा रही। जहां उन्होंने अपनी कैंसर पीड़ित पत्नी और दिव्यांग बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी अकेले उठाई। पत्नी की मृत्यु के बाद से उनकी जिम्मेदारी और कठिनाइयां और भी बढ़ गईं।
 
घटना के कारण और पुलिस की कार्रवाई
शुरुआती जांच के अनुसार, हीरालाल की मानसिक स्थिति पत्नी की मृत्यु और बच्चों की देखभाल के चलते बेहद खराब हो चुकी थी। बच्चों की देखभाल और अपनी दयनीय स्थिति से निराश होकर उन्होंने खुदकुशी का रास्ता चुना। शुक्रवार को पुलिस ने जब उनके कमरे का दरवाजा तोड़ा तो अंदर से बदबू आ रही थी और सभी के शव जमीन पर पड़े थे। पुलिस ने शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और मामले की जांच शुरू कर दी है।
 
गांव में शोक का माहौल
हीरालाल की खुदकुशी की खबर मिलते ही उनके पैतृक गांव घोघिया में मातम पसर गया है। बुजुर्ग पिता मरई शर्मा गहरे सदमे में हैं और गांव के लोग स्तब्ध हैं। आसपास के लोग यह समझ नहीं पा रहे कि आखिर भगवान किसी इंसान पर इतनी बड़ी मुश्किलें क्यों डालता है। ग्रामीणों का कहना है कि हीरालाल एक मेहनती और धैर्यवान व्यक्ति था, लेकिन हालात ने उसे इतना तोड़ दिया कि उसने अपने जीवन का अंत कर लिया।

बहादुर मां ने कैंसर से जूझते हुए 17 साल तक बेटियों को पाला, पर पिता मुश्किल घड़ी में हार गया

एक मां जो अपनी चार दिव्यांग बेटियों को पिछले 17 सालों से पाल रही थी, वह कैसी रही होगी? मां तो हमेशा अपने बच्चों के लिए सबसे बड़ा सहारा होती है, चाहे हालात कैसे भी हों। सुनीता देवी, जो खुद कैंसर से जूझ रही थीं, अपनी चारों बेटियों के लिए सब कुछ थीं। उन्होंने हर वह काम किया जो एक मां करती है, भले ही उनकी बेटियां खुद कुछ न कर पाती थीं। उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक अपने बच्चों की हर जरूरत का ध्यान रखा, यह जानते हुए भी कि उनकी जिंदगी खत्म हो रही है। अपनी लड़ाई को अनदेखा करते हुए, सुनीता ने यह सुनिश्चित किया कि उनकी बेटियों को उनके न रहने के बाद भी कोई कमी महसूस न हो।
 
गरीबी और संसाधनों की कमी ने बनाया असहाय
लेकिन सुनीता की जिंदगी कैंसर से लड़ते हुए खत्म हो गई और उन्हें इस दुनिया को अलविदा कहना पड़ा। उनके पति, हीरालाल शर्मा, एक साधारण मजदूर थे। उन्होंने अपनी पत्नी का इलाज कराने की कोशिश की, लेकिन गरीबी और संसाधनों की कमी ने उन्हें असहाय बना दिया। सुनीता की मौत के बाद, हीरालाल को अपनी चारों दिव्यांग बेटियों की देखभाल अकेले करनी पड़ी। नीतू, निशी, नीरू और निधि इन चारों बेटियों की जिम्मेदारी अब पूरी तरह से हीरालाल पर आ गई थी।
 
हताशा और बेबसी ने घेरा
दिल्ली के एक छोटे से इलाके में हीरालाल अपनी बेटियों के साथ रह रहे थे। पत्नी के चले जाने के बाद उनकी जिंदगी और भी मुश्किल हो गई थी। वह एक निजी कंपनी में मजदूरी करते थे, लेकिन उनकी मजदूरी से घर चलाना, बेटियों का इलाज कराना और उनका लालन-पालन करना लगभग असंभव सा हो गया था। समाज का भेदभाव और आर्थिक तंगी ने उनकी मानसिक स्थिति को और खराब कर दिया था। हर दिन काम के बाद घर लौटने पर उन्हें अपने जीवन में केवल हताशा और बेबसी ही दिखाई देती थी।

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भविष्य की सोचकर छोड़ दी दुनिया
एक रात जब हीरालाल ने अपनी चारों बेटियों को सोते हुए देखा तो उन्हें उनकी मजबूरी और अपने हालात की असहायता का गहरा एहसास हुआ। उन्होंने सोचा कि उनके बाद उनकी बेटियों की देखभाल कौन करेगा? कौन उनकी जरूरतें पूरी करेगा, जब वह खुद जिंदगी की चुनौतियों से जूझ रहे हैं? यह सवाल बार-बार उनके मन में घूमने लगे। हीरालाल का दिल उन विचारों से भर गया जो उन्हें अपने फैसले की ओर धकेल रहे थे। आखिरकार, उन्होंने वह भयानक निर्णय लिया जो एक पिता के लिए सबसे कठिन होता है। आखिर में उन्होंने अपनी बेटियों और खुद को इस दुनिया से विदा करने का कठोर कदम उठा लिया।

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