दिल्ली के वसंत कुंज स्थित रंगपुरी गांव में एक दिल दहला देने वाली घटना घटी, जहां सारण जिले के मसरख थानाक्षेत्र के घोघिया गांव के निवासी हीरालाल शर्मा (42) ने अपनी चार दिव्यांग बेटियों के साथ मिलकर आत्महत्या कर ली। गुरुवार रात को जहरीला पदार्थ खाने के बाद शुक्रवार को पुलिस ने दरवाजा तोड़कर पांचों शवों को बाहर निकाला। घटना की खबर मिलते ही मृतक के पैतृक गांव घोघिया में मातम का माहौल छा गया। उनके बुजुर्ग पिता मरई शर्मा सदमे से बेहोश हो गए।
एक मां जो अपनी चार दिव्यांग बेटियों को पिछले 17 सालों से पाल रही थी, वह कैसी रही होगी? मां तो हमेशा अपने बच्चों के लिए सबसे बड़ा सहारा होती है, चाहे हालात कैसे भी हों। सुनीता देवी, जो खुद कैंसर से जूझ रही थीं, अपनी चारों बेटियों के लिए सब कुछ थीं। उन्होंने हर वह काम किया जो एक मां करती है, भले ही उनकी बेटियां खुद कुछ न कर पाती थीं। उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक अपने बच्चों की हर जरूरत का ध्यान रखा, यह जानते हुए भी कि उनकी जिंदगी खत्म हो रही है। अपनी लड़ाई को अनदेखा करते हुए, सुनीता ने यह सुनिश्चित किया कि उनकी बेटियों को उनके न रहने के बाद भी कोई कमी महसूस न हो।
गरीबी और संसाधनों की कमी ने बनाया असहाय
लेकिन सुनीता की जिंदगी कैंसर से लड़ते हुए खत्म हो गई और उन्हें इस दुनिया को अलविदा कहना पड़ा। उनके पति, हीरालाल शर्मा, एक साधारण मजदूर थे। उन्होंने अपनी पत्नी का इलाज कराने की कोशिश की, लेकिन गरीबी और संसाधनों की कमी ने उन्हें असहाय बना दिया। सुनीता की मौत के बाद, हीरालाल को अपनी चारों दिव्यांग बेटियों की देखभाल अकेले करनी पड़ी। नीतू, निशी, नीरू और निधि इन चारों बेटियों की जिम्मेदारी अब पूरी तरह से हीरालाल पर आ गई थी।
हताशा और बेबसी ने घेरा
दिल्ली के एक छोटे से इलाके में हीरालाल अपनी बेटियों के साथ रह रहे थे। पत्नी के चले जाने के बाद उनकी जिंदगी और भी मुश्किल हो गई थी। वह एक निजी कंपनी में मजदूरी करते थे, लेकिन उनकी मजदूरी से घर चलाना, बेटियों का इलाज कराना और उनका लालन-पालन करना लगभग असंभव सा हो गया था। समाज का भेदभाव और आर्थिक तंगी ने उनकी मानसिक स्थिति को और खराब कर दिया था। हर दिन काम के बाद घर लौटने पर उन्हें अपने जीवन में केवल हताशा और बेबसी ही दिखाई देती थी।