फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मोदी की रैली ने निकाला किसानों का 'दिवाला'

विज्ञापन
विज्ञापन
हाजीपुर के निकट सुल्तानपुर गांव का वो इलाक़ा आज सुनसान है, जहाँ रविवार को प्रधानमंत्री मोदी की रैली की ख़ूब चर्चा थी। रैली के लिए जो तैयारियाँ की गई थीं, बांस और बल्ली लगाए गए थे, अब हटाए जा रहे हैं। छोटे-छोटे ट्रकों से सामान ढोया जा रहा है, कुछ दिनों पहले जो मज़दूर मंच बनाने और घेराबंदी करने में लगे थे, अब वही मज़दूर उसे हटाने में लगे हैं।
विज्ञापन


लेकिन प्रधानमंत्री की रैली के लिए जिन किसानों की धान की खेती काट दी गई, उनमें से कुछ नाराज़ हैं, कुछ लोगों को मुआवज़े की कम राशि पर ऐतराज़ है, तो कुछ लोग चुनिंदा लोगों के विरोध को राजनीति से जोड़कर देख रहे हैं।

लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो राजनीतिक तौर पर नरेंद्र मोदी का विरोध कर रहे हैं, लेकिन वे मुआवज़े की राशि से संतुष्ट हैं। रैली वाले क्षेत्र में बिंदेश्वर राय के पास दो एकड़ से ज़्यादा ज़मीन है, चार-पांच कट्ठा छोड़कर उनकी बाक़ी ज़मीन से धान की फ़सल काट दी गई।
विज्ञापन


वे कहते हैं, "हम रैली में नहीं गए थे। मेरी नाराज़गी इसलिए हैं क्योंकि लोगों को अलग-अलग मुआवज़े की राशि मिली है। कुछ लोगों को पांच हज़ार का मुआवज़ा मिला, मुझे सिर्फ़ 1900 मिला है। मेरा पंप सेट टूट गया और शीशम के एक पेड़ को भी नुक़सान पहुंचा है।"

फसल चौपट होने से किसानों में नाराजगी

और तो और जिसके खेत में हेलिपैड बनाया गया था, वो तो और निराश हैं, क्योंकि ईंट, बालू और सीमेंट के इस्तेमाल के कारण उन्हें अपने खेत को उपजाऊ बनाने में लंबा समय लगेगा।

लालऊ सिंह कहते हैं, "हेलिपैड बनाने के लिए ज़मीन का इस्तेमाल हुआ। लेकिन मुआवज़ा उतना ही मिला, जितना सबको मिला। लेकिन इसे खेती लायक़ बनाने में दो-ढाई साल का समय लग जाएगा।"

लेकिन इस रैली के कारण प्रभावित हुए लोगों में एक और तबक़ा बटाईदारों का है, जो खेत के मालिक नहीं हैं, उन्होंने पूंजी तो पूरी लगाई, लेकिन मुआवज़ा खेत के मालिकों को मिला और उन्हें इसका बहुत कम हिस्सा मिला।

एक बटाईदार कहते हैं, "मुझे तो मुआवज़ा भी कम मिला है, पूंजी पूरी लगाई। लेकिन मुआवज़ा मालिक को ज़्यादा मिला।" रैली के विरोध को लेकर भी लोग एकमत नहीं है, कई लोगों का कहना है कि गाँव में किसी ने रैली का विरोध नहीं किया। कुछ लोग अगर रैली में नहीं आए, तो ऐसा राजनीतिक विरोध के चलते था न कि मुआवज़ा के कारण।
विज्ञापन

समर्थकों ने कहा- नहीं है कोई नाराजगी

पप्पू पासवान कहते हैं, "देखिए मुआवज़ा सबको मिला है, लेकिन अब जिनको आना ही नहीं था, वे रैली में नहीं आए। लेकिन गांव के 99 प्रतिशत लोग रैली में आए थे।"

सुल्तानपुर गांव के रामजनम रॉय खुलकर नरेंद्र मोदी का विरोध तो करते हैं, लेकिन कहते हैं कि मुआवज़े की राशि उचित थी और गांव में किसी ने रैली का बहिष्कार नहीं किया था। वे कहते हैं कि कम बारिश के कारण धान की खेती पर काफ़ी असर था, अगर मुआवज़ा नहीं मिलता तो वैसे भी खेती बर्बाद ही हो रही थी।

दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि आरोप बेबुनियाद हैं और किसानों को उचित मुआवज़ा दिया गया है। वैशाली के ज़िला भाजपा प्रमुख संजय सिंह कहते हैं कि किसानों की सहमति से ही सब कुछ हुआ है।

लेकिन इतना तो तय है कि ये एक जगह की बात नहीं है, बड़े नेताओं की रैली के कारण किसानों की खेती पर असर पड़ता है और मुआवज़े की राशि को लेकर नाराज़गी भी इसी का एक हिस्सा है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें